भ्रूण में गंभीर दोष होने के कारण गर्भपात की अनुमति देने वाला मद्रास उच्च न्यायालय का महत्वपूर्ण निर्णय
जब बच्चा गरिमापूर्ण जीवन नहीं जी सकता, तो माँ के निर्णय का सम्मान किया जाना चाहिए
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 5:57 · अपडेट सुबह 6:06 · 4 मिनट का पाठ
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मद्रास उच्च न्यायालय ने एक महिला को उसके गर्भ में गंभीर दोष पाए जाने के बाद गर्भपात करने की अनुमति दे दी है। न्यायालय ने टिप्पणी की कि जब कोई माँ भ्रूण में दोषों के कारण बच्चे को जन्म न देने का हृदयविदारक निर्णय लेती है, तो न्यायालय को उस निर्णय के आगे झुकना चाहिए। जस्टिस पी.टी. आशा ने अपने फैसले में कहा कि माँ को यह निर्णय लेने का अधिकार है कि वह ऐसे बच्चे को दुनिया में लाना चाहती है या नहीं, खासकर तब जब बच्चा सामान्य जीवन जीने में सक्षम न हो।
जस्टिस आशा ने आगे कहा कि याचिकाकर्ता माँ ने बच्चे के गरिमापूर्ण और आत्मनिर्भर जीवन जीने की संभावनाओं में निहित महत्वपूर्ण जोखिमों को देखते हुए यह दर्दनाक और अंतिम कदम उठाया है, इसलिए न्यायालय को इस निर्णय को स्वीकार करना चाहिए। न्यायालय ने उल्लेख किया कि ऐसे बच्चे को प्रतिदिन जो पीड़ा सहनी पड़ती है, उसे देखने की जिम्मेदारी माता-पिता की होती है। माता-पिता ने यह निर्णय इसलिए लिया है ताकि बच्चे को अपमानजनक जीवन जीने के लिए इस दुनिया में न लाना पड़े। इसके अलावा, अजन्मे बच्चे को भी गरिमापूर्ण जीवन जीने का अधिकार है और वह किसी के मजाक का कारण नहीं बनना चाहिए। न्यायालय ने माता-पिता के जीवनकाल के बाद इस बच्चे के जीवन के बारे में सोचने की आवश्यकता पर भी जोर दिया।
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, चेन्नई के एगमोर स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजी और गवर्नमेंट हॉस्पिटल फॉर विमेन एंड चिल्ड्रन ने 13 अक्टूबर, 2026 को गर्भपात करने से इनकार कर दिया था। अस्पताल के चेयरपर्सन द्वारा जारी की गई कार्यवाही में कहा गया था कि मेडिकल बोर्ड ने राय दी थी कि न्यूरोलॉजिकल दोष जानलेवा नहीं हैं, इसलिए गर्भपात नहीं किया जा सकता। हालांकि, उच्च न्यायालय ने इस कार्यवाही को रद्द कर दिया है और तत्काल गर्भपात का आदेश दिया है, क्योंकि गर्भधारण को 24 सप्ताह से अधिक का समय हो गया था।
केस के विवरण के अनुसार, याचिकाकर्ता महिला और उसके पति को 2024 में एक पुत्र हुआ था और यह उनकी दूसरी प्रेग्नेंसी थी। महिला की ट्राइमेस्टर स्कैन रिपोर्ट में माइल्ड वेंट्रिकुलोमेगाली (सेरेब्रोस्पाइनल फ्लूइड के जमा होने के कारण मस्तिष्क के वेंट्रिकल्स का विस्तार) पाया गया था। इस दोष की पुष्टि के लिए दंपत्ति ने दूसरे डॉक्टर की राय ली थी, जिसमें भी इस दोष की पुष्टि हुई थी।
इसके बाद जब महिला ने अल्ट्रासाउंड स्कैन कराया, तो एक्सटेंडेड न्यूरोनोग्राफी रिपोर्ट में डॉक्टरों ने एजेनेसिस ऑफ कॉर्पस कैलोसम (जन्मजात सेरेब्रल दोष) और बाईलेटरल मॉडरेट वेंट्रिकुलोमेगाली दर्ज किया। डॉक्टरों ने दंपत्ति को सूचित किया था कि एजेनेसिस कॉर्पस कैलोसम वाले भ्रूणों में विकासात्मक कठिनाइयों का जोखिम बढ़ जाता है, जिसमें संज्ञानात्मक शिथिलता, व्यवहार संबंधी समस्याएं, सामाजिक संवाद में कठिनाई, मिर्गी और बौद्धिक अक्षमता शामिल हैं।
दंपत्ति को आगे बताया गया था कि जन्म से पहले दोष की सटीक मात्रा का विश्वसनीय रूप से अनुमान नहीं लगाया जा सकता। यदि अतिरिक्त सेरेब्रल दोष या आनुवंशिक दोष हों, तो जोखिम काफी बढ़ जाता है। इन सभी गंभीर परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए दंपत्ति ने गर्भपात करने का निर्णय लिया था। लेकिन जब डॉक्टरों ने इस प्रक्रिया को करने से मना कर दिया, तो उन्होंने न्यायिक सहायता के लिए न्यायालय का दरवाजा खटखटाया।
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