निर्मला सप्रे की विधायक के रूप में सदस्यता पर 2 महीने में निर्णय लेने का सुप्रीम कोर्ट का आदेश
मध्य प्रदेश विधानसभा अध्यक्ष को दलबदल विरोधी कानून के तहत याचिका पर तत्काल कार्रवाई करने का निर्देश दिया गया है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, शाम 5:13 · अपडेट शाम 5:20 · 4 मिनट का पाठ
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मध्य प्रदेश की बीना विधानसभा सीट की विधायक निर्मला सप्रे की सदस्यता को लेकर चल रहे लंबे विवाद में सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और कड़ा निर्देश दिया है। सर्वोच्च अदालत ने मध्य प्रदेश विधानसभा के अध्यक्ष को स्पष्ट आदेश दिया है कि वे निर्मला सप्रे के खिलाफ दायर अयोग्यता की याचिका पर अगले 2 महीने के भीतर अंतिम निर्णय लें। यह पूरा मामला दलबदल विरोधी कानून से जुड़ा है और यह याचिका पिछले 2 साल से अधिक समय से विधानसभा में लंबित पड़ी थी।
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत, न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ ने सुनवाई की। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत दायर की जाने वाली अयोग्यता की याचिकाओं पर बहुत ही तेजी से निर्णय लेना अनिवार्य है। सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के पूर्व के रुख से असहमति व्यक्त की। हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष को किसी निश्चित समय सीमा में निर्णय लेने का निर्देश देने से इनकार कर दिया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने उचित नहीं माना।
निर्मला सप्रे के खिलाफ यह अयोग्यता की याचिका मध्य प्रदेश विधानसभा में विपक्ष के नेता उमंग सिंघार ने दायर की थी। याचिका में गंभीर आरोप लगाया गया है कि निर्मला सप्रे ने स्वेच्छा से कांग्रेस पार्टी की सदस्यता छोड़ दी है और वे भाजपा की राजनीतिक गतिविधियों में सक्रिय रूप से शामिल हो गई हैं। उल्लेखनीय है कि निर्मला सप्रे 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की टिकट पर सागर जिले की बीना सीट से चुनी गई थीं। आरोप के मुताबिक, मई 2024 में लोकसभा चुनाव के प्रचार के दौरान वे मुख्यमंत्री मोहन यादव की उपस्थिति में भाजपा के मंच पर देखी गई थीं और उन्होंने भाजपा में शामिल होने की घोषणा भी की थी।
दूसरी तरफ, निर्मला सप्रे ने इन सभी आरोपों को नकार दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि उन्होंने न तो कांग्रेस पार्टी से इस्तीफा दिया है और न ही उन्होंने आधिकारिक रूप से भाजपा की सदस्यता स्वीकार की है। इस विवाद के कारण उमंग सिंघार ने पहले मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में याचिका दायर करके विधानसभा अध्यक्ष को समय सीमा में निर्णय लेने का आदेश देने की मांग की थी। तब हाईकोर्ट ने यह अवलोकन किया था कि विधानसभा अध्यक्ष के समक्ष कार्रवाई चल रही है और उसमें तत्काल हस्तक्षेप करने की कोई आवश्यकता नहीं है। हाईकोर्ट ने सप्रे के इनकार को भी ध्यान में लिया था।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के इस दृष्टिकोण से असहमति दर्शाते हुए कहा कि, भले ही किसी मामले में तत्काल जल्दबाजी न दिखती हो या विधानसभा का कार्यकाल पूर्ण होने में अभी समय बाकी हो, लेकिन दसवीं अनुसूची के तहत याचिकाओं का निपटारा हमेशा तेजी से होना चाहिए। याचिकाकर्ता उमंग सिंघार की ओर से वरिष्ठ वकील विवेक तन्खा ने पक्ष रखा। उन्होंने दलील दी कि यह मामला संविधान की दसवीं अनुसूची की गरिमा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। तन्खा ने कोर्ट में बताया कि सप्रे कांग्रेस छोड़कर दूसरे राजनीतिक दल के साथ प्रचार कर रही हैं, इसके बावजूद विधानसभा अध्यक्ष स्तर पर कोई निर्णय नहीं लिया गया है।
सुप्रीम कोर्ट ने सभी पक्षों की दलीलों और याचिका के लंबे समय से लंबित होने को ध्यान में रखते हुए विधानसभा अध्यक्ष को 2 महीने के भीतर निर्णय लेने का आदेश दिया है। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने स्वयं निर्मला सप्रे की अयोग्यता को लेकर कोई अंतिम फैसला नहीं दिया है। अब इस मामले में अंतिम निर्णय लेने की जिम्मेदारी पूरी तरह से विधानसभा अध्यक्ष की रहेगी।
निर्मला सप्रे मध्य प्रदेश के सागर जिले की बीना विधानसभा सीट का प्रतिनिधित्व करने वाली विधायक थीं। वे 2023 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की उम्मीदवार के रूप में विजयी हुई थीं। दलबदल विरोधी कानून, जो संविधान की दसवीं अनुसूची में शामिल है, वह चुने हुए प्रतिनिधियों को दल बदलने पर अयोग्य ठहराने का प्रावधान करता है, जिसका उद्देश्य राजनीतिक स्थिरता बनाए रखना है।
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