डिजिटल धोखाधड़ी के शिकार लोगों को मुआवजा देने के लिए बैंक जिम्मेदार होंगे: सुप्रीम कोर्ट
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों को ग्राहकों के लिए 'सुरक्षा कवच' बनने और धोखाधड़ी के मामलों में नुकसान की भरपाई करने का निर्देश दिया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
30 अक्टूबर 2026, सुबह 1:36 · अपडेट दोपहर 12:10 · 6 मिनट का पाठ
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डिजिटल धोखाधड़ी के बढ़ते मामलों पर सख्त रुख अपनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि बैंकों की लापरवाही के कारण ग्राहकों के साथ धोखाधड़ी होती है, तो नुकसान की पूरी भरपाई करने की जिम्मेदारी वित्तीय संस्थानों की होगी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बैंकों को अपने ग्राहकों के लिए एक 'सुरक्षा कवच' के रूप में काम करना चाहिए। इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को भी आड़े हाथों लिया और साइबर धोखाधड़ी के मामलों में बैंकों की जवाबदेही तय करने पर जोर दिया।
मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली जस्टिस जोयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस मामले में स्वतः संज्ञान (suo motu) लेते हुए सुनवाई की। कोर्ट ने सवाल उठाया कि जब वित्तीय संस्थान करोड़ों रुपये के ऋण को वन-टाइम सेटलमेंट के रूप में माफ कर सकते हैं, तो वे ग्राहकों को हुए नुकसान के लिए जिम्मेदार क्यों नहीं हो सकते? कोर्ट ने आगे कहा कि यदि बैंकों के कर्मचारी ऐसी धोखाधड़ी में शामिल पाए जाते हैं, तो बैंकों को पीड़ित को मुआवजा देना ही होगा।
सुनवाई के दौरान एमिकस क्यूरी के रूप में पेश हुए सीनियर एडवोकेट एन.एस. नप्पिनई ने कोर्ट को बताया कि लगातार प्रयासों के बावजूद घोटाले जारी हैं। उन्होंने हाल की एक घटना का उल्लेख किया जिसमें एक महिला ने ₹2.5 करोड़ गंवा दिए थे। इस तरह की धोखाधड़ी में जालसाज पुलिस अधिकारियों, सरकारी अधिकारियों या न्यायिक अधिकारियों होने का ढोंग करते हैं और पीड़ित को गिरफ्तारी की धमकी देकर पैसे ट्रांसफर करने के लिए मजबूर करते हैं।
मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत ने बैंकों की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा, "पीड़ितों की रक्षा करना बैंकरों के रूप में आपका कर्तव्य है; सक्षम अधिकारी क्या कर रहे हैं?" उन्होंने एक उदाहरण देते हुए पूछा कि यदि कोई व्यक्ति सामान्य रूप से केवल ₹10,000 या ₹20,000 निकालता है और अचानक उसके खाते से ₹50,000 निकाल लिए जाते हैं, तो क्या बैंक को इस लेनदेन को तुरंत फ्लैग (सूचित) नहीं करना चाहिए? कोर्ट ने यह भी नोट किया कि ग्राहकों ने बैंकों को उनके खातों के विवरण और लेनदेन के इतिहास का उपयोग करने की अनुमति दी है, इसलिए बैंकों को सावधानी बरतनी चाहिए।
अदालत ने 'डिजिटल अरेस्ट' जैसे अपराधों के शिकार लोगों को कम से कम उनकी गंवाई गई पूरी राशि का मुआवजा मिलना चाहिए, यह स्पष्ट किया है, यदि वह धोखाधड़ी बैंक की उचित जांच (due diligence) में कमी के कारण हुई हो। कोर्ट ने बैंकों के लिए अनिवार्य निवारक उपायों पर जोर देते हुए कहा कि धोखाधड़ी के मामलों में उनकी निष्क्रियता स्वीकार्य नहीं है। बैंकों को असामान्य लेनदेन के बारे में नजदीकी पुलिस स्टेशन को तत्काल सूचित करना चाहिए।
केंद्र सरकार की ओर से पेश हुए अटॉर्नी जनरल आर. वेंकटरमणी ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप और जन जागरूकता अभियानों के कारण 'डिजिटल अरेस्ट' के मामलों में पिछले साल की तुलना में 50 प्रतिशत की कमी आई है। हालांकि, मुख्य न्यायाधीश ने नोट किया कि इस कमी के बावजूद, देश में चालू वर्ष में ऐसे अपराधों से लगभग ₹800 करोड़ का नुकसान हुआ है। एमिकस क्यूरी ने इस बात पर आश्चर्य व्यक्त किया कि शिक्षित लोग भी इस जाल में फंस रहे हैं, जिस पर सीजेआई ने कहा कि लोगों को मोबाइल पर डिजिटल अरेस्ट से डरने के बजाय जागरूक होना चाहिए।
हिंदुस्तान टाइम्स की 23 अक्टूबर की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 के पहले आठ महीनों में ₹647 करोड़ से अधिक की 'डिजिटल अरेस्ट' धोखाधड़ी की 21,900 से अधिक शिकायतें दर्ज की गई थीं। ये आंकड़े भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और गृह मंत्रालय (MHA) द्वारा सुप्रीम कोर्ट में दाखिल किए गए स्टेटस रिपोर्ट का हिस्सा थे।
सुप्रीम कोर्ट ने बैंकों की जवाबदेही और अवैध पैसे के ट्रांसफर के लिए इस्तेमाल होने वाले 'म्यूल अकाउंट्स' की समस्या पर सख्त कदम उठाने की बात कही है। म्यूल अकाउंट्स वे बैंक खाते हैं जो साइबर अपराध सहित अवैध गतिविधियों के माध्यम से प्राप्त पैसे को प्राप्त करने या ट्रांसफर करने के लिए उपयोग किए जाते हैं। इससे पहले, अगस्त महीने में सुप्रीम कोर्ट ने RBI को म्यूल अकाउंट्स और साइबर-सक्षम वित्तीय धोखाधड़ी से निपटने वाले बैंकों के लिए एक ढांचा और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) तैयार करने का निर्देश दिया था।
अदालत ने RBI को अगले आदेश तक सभी अधिकृत वित्तीय संस्थानों की सूची सौंपने का निर्देश दिया है। कोर्ट RBI के प्रस्तावित 'KYC संशोधन दिशानिर्देश 2026' की समीक्षा करेगा ताकि यह जाना जा सके कि उचित जांच करने में विफलता के मामलों में मुआवजा देने के लिए कानूनी ढांचा कितना प्रभावी है। अटॉर्नी जनरल ने सुझाए गए SOP तैयार करने के लिए अधिक समय मांगा था, जिसे कोर्ट ने 30 नवंबर तक मंजूर कर लिया है। इसके साथ ही RBI को इन दिशानिर्देशों को साल के अंत तक लागू करने का निर्देश दिया गया है।
इसके अलावा, कोर्ट ने यह मुद्दा भी उठाया कि जब कुछ बैंक कर्मचारी खुद ही खातों के दुरुपयोग में शामिल होने के कथित आरोपी हैं, तो RBI सुरक्षा उपायों के लिए बैंकों के साथ परामर्श क्यों कर रहा है? व्हाट्सएप द्वारा भी इस मामले में जानकारी दी गई कि उसने अब तक 9,400 संदिग्ध खातों को प्रतिबंधित किया है। सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से भारत के डिजिटल वित्तीय ढांचे में ग्राहकों की सुरक्षा के लिए बड़ा बदलाव आ सकता है, क्योंकि अब बैंकों के लिए अपनी फ्रॉड डिटेक्शन और मॉनिटरिंग सिस्टम को मजबूत करना अनिवार्य होगा।
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