मतदाता सूची संशोधन में केवल आधार कार्ड अपर्याप्त, बीएलओ को नागरिकता के प्रमाण मांगने का आदेश
दिल्ली के बूथ लेवल अधिकारियों को मतदाताओं से अतिरिक्त दस्तावेज़ एकत्र करने के निर्देश दिए गए
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 12:56 · 6 मिनट का पाठ
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दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान 'नो मैपिंग' का नोटिस मिलने पर जिन मतदाताओं ने प्रमाण के रूप में केवल आधार कार्ड प्रस्तुत किया था, वे अब फिर से जांच के दायरे में आ गए हैं। 'द हिंदू' की एक रिपोर्ट के अनुसार, राष्ट्रीय राजधानी के विभिन्न निर्वाचन क्षेत्रों के बूथ लेवल अधिकारियों (BLOs) को निर्देश दिया गया है कि वे इन मतदाताओं से नागरिकता साबित करने वाले अतिरिक्त दस्तावेज़ एकत्र करें।
कुछ बीएलओ ने 'द हिंदू' को बताया कि उन्होंने फील्ड वेरिफिकेशन रिपोर्ट और गारंटी पत्र प्रस्तुत किए थे, जिनमें पुष्टि की गई थी कि मतदाता पात्र हैं और वर्षों से उस पते पर रह रहे हैं। इसके बावजूद, इलेक्टोरल रजिस्ट्रेशन ऑफिसर्स (EROs) ने उन्हें फिर से मतदाताओं के पास जाने और ऐसे दस्तावेज़ मांगने का निर्देश दिया है जिससे यह साबित हो सके कि वे 'बांग्लादेशी' या 'रोहिंग्या' नहीं हैं।
यह नई जांच ऐसे समय में हो रही है जब दिल्ली मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) के कार्यालय द्वारा पिछले सप्ताह साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में नोटिस दिए गए 33.1 लाख मामलों में से 94% से अधिक मामलों को अंतिम सूची के लिए मंजूरी दी गई थी। 'द हिंदू' ने उल्लेख किया है कि जिन मतदाताओं ने केवल आधार कार्ड दिया था, उन्हें ERO और असिस्टेंट ERO (AERO) सिस्टम में फ्लैग किया गया था। इस कारण बीएलओ को चुनाव आयोग (ECI) द्वारा निर्धारित 11 दस्तावेज़ों में से आवश्यक कागजात एकत्र करने के आदेश मिले हैं। हालांकि, ERO के पास यह अधिकार है कि यदि वे बीएलओ की फील्ड रिपोर्ट और गारंटी से संतुष्ट हैं, तो वे मतदाता को पात्र मानकर अंतिम सूची में शामिल कर सकते हैं।
नॉर्थ-ईस्ट डिस्ट्रिक्ट के एक बीएलओ ने बताया, "मैं इन मतदाताओं को कई वर्षों से जानता हूं, कुछ बहुत वृद्ध हैं। वे कहते हैं कि उनके पास अन्य कोई दस्तावेज़ नहीं हैं, बैंक खाता भी नहीं है, लेकिन मुझे उनके पास फिर से जाना होगा।" एक अन्य बीएलओ ने शिकायत की कि दस्तावेज़ एकत्र करने के निर्देश बार-बार बदलते रहे हैं, जिससे भ्रम पैदा हुआ है। उन्होंने बताया कि शुरू में उन्हें कहा गया था कि कोई भी उपलब्ध दस्तावेज़ लेकर वेरिफिकेशन रिपोर्ट के आधार पर गारंटी दी जा सकती है और कोई भी कागज़ स्कैन करके अपलोड करने से केस क्लियर हो जाएगा। लेकिन जब उन्होंने इन निर्देशों का पालन किया, तो नियम फिर बदल गए।
इस बीएलओ ने आगे बताया कि सोमवार को उनके ERO ने उन्हें फोन करके पूछा कि केवल आधार कार्ड के आधार पर कोई व्यक्ति 'रोहिंग्या' या 'बांग्लादेशी' नहीं है, इसकी पुष्टि कैसे की जा सकती है। उन्होंने कहा कि मतदाता वर्षों से वहां रह रहे हैं और कई लोग कभी स्कूल नहीं गए। एक अन्य बीएलओ ने सवाल उठाया कि देश में नागरिकता का प्रमाण क्या माना जाए? उन्होंने आधार और बैंक पासबुक की प्रतियां एकत्र की थीं, लेकिन अब बैठक में और अधिक दस्तावेज़ मांगने को कहा गया है। एक मामले में तो पासपोर्ट प्रस्तुत करने वाले मतदाता को भी पुन: जांच के लिए दस्तावेज़ देने को कहा गया है।
दूसरी ओर, वरिष्ठ अधिकारियों ने ऐसे किसी निर्देश दिए जाने से इनकार किया है। उन्होंने कहा कि मतदाता सूची में 'अवैध प्रवासियों' का कोई रिकॉर्ड या पहचान नहीं रखी जा रही है। एक वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया कि हालांकि केवल आधार कार्ड पर्याप्त नहीं है, लेकिन यदि बीएलओ की फील्ड रिपोर्ट संतोषजनक है तो ERO मतदाता को पात्र घोषित कर सकता है। एक ERO ने बताया कि शुरू में गणना चरण के दौरान विदेशी नागरिकों की पहचान करने का निर्देश दिया गया था, लेकिन बाद में वे निर्देश बदल दिए गए और अब ऐसी कोई सूची तैयार नहीं की जा रही है।
चुनाव आयोग ने पात्रता साबित करने के लिए जन्म प्रमाण पत्र, शैक्षिक प्रमाण पत्र और पासपोर्ट सहित 11 दस्तावेज़ निर्धारित किए हैं। 'स्क्रॉल' की रिपोर्ट के अनुसार, मई में सुप्रीम कोर्ट ने इस प्रक्रिया की वैधता को बरकरार रखा था, लेकिन स्पष्ट किया था कि चुनाव आयोग यह तय नहीं कर सकता कि कोई व्यक्ति भारतीय नागरिक है या नहीं।
दिल्ली के ड्राफ्ट इलेक्टोरल रोल में शामिल 97.5 लाख मतदाताओं में से 33.1 लाख को उनकी पात्रता साबित करने के लिए नोटिस दिया गया था। इनमें से 13.7 लाख मतदाता पिछले विशेष सघन पुनरीक्षण की सूची से जुड़े नहीं थे, जबकि शेष 19.3 लाख मामलों में उनके फॉर्म में 'तार्किक विसंगतियां' (logical discrepancies) पाई गई थीं। दिल्ली मुख्य निर्वाचन अधिकारी के कार्यालय ने 27 अक्टूबर को बताया था कि 33.1 लाख मामलों में से 31.2 लाख मामलों को अंतिम मतदाता सूची में शामिल करने के लिए क्लियर कर दिया गया है।
नोटिसों के निपटान की समय सीमा अब 15 दिसंबर तक बढ़ा दी गई है और अंतिम मतदाता सूची 22 दिसंबर को प्रकाशित होने की संभावना है। 'स्क्रॉल' के अनुसार, 2025 में बिहार में मतदाता सूची पुनरीक्षण का पहला चरण चलाया गया था। दूसरे चरण में 2025 के अंत और 2026 के पहले छमाही में 12 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को शामिल किया गया था। वर्तमान में तीसरे चरण की प्रक्रिया 19 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में चल रही है। इस पूरी प्रक्रिया के दौरान यह चिंता व्यक्त की गई है कि इस पुनरीक्षण से असली मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं और इससे चुनाव परिणामों पर असर पड़ सकता है।
विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) मतदाता सूचियों को अपडेट करने और उनमें मौजूद त्रुटियों को सुधारने की एक प्रक्रिया है, जिसका उद्देश्य चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता लाना और केवल पात्र नागरिकों को ही मतदान का अधिकार देना है।
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