महाराष्ट्र की कृष्णा-भीमा नदी मोड़ योजना के खिलाफ कर्नाटक का कड़ा विरोध
राज्य के हितों को नुकसान पहुंचाने वाली इस योजना के खिलाफ पक्ष द्वारा मजबूत आपत्ति उठाने की सरकार की घोषणा।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, सुबह 3:52 · 4 मिनट का पाठ
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द हिन्दू के रिपोर्ट के अनुसार, महाराष्ट्र की कृष्णा नदी के पानी की मोड़ योजना के खिलाफ कर्नाटक द्वारा मजबूत आपत्ति उठाई जाएगी क्योंकि इससे कर्नाटक के हितों को नुकसान पहुंचेगा। विजयपुरा जिले के प्रभारी मंत्री और भारी व मध्यम उद्योग मंत्री एम.बी. पाटिल ने रविवार को विजयपुरा में पत्रकारों के साथ बातचीत करते हुए इस घोषणा की थी। इससे पहले सिंचाई मंत्री रह चुके पाटिल ने बताया कि, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कृष्णा नदी से लगभग ४० टीएमसीएफटी पानी भीमा नदी में मोड़ने की योजना की घोषणा की है। यह बिल्कुल अस्वीकार्य है और प्रस्तावित योजना से कर्नाटक के हितों को गंभीर नुकसान होगा, इसलिए हम इसके खिलाफ आपत्ति उठाएंगे।
इस पहल के लिए केंद्र सरकार के समक्ष दो मुद्दों पर स्पष्टता मांगते हुए पाटिल ने सवाल किया था कि, महाराष्ट्र सरकार किस आधार पर इस प्रोजेक्ट को आगे बढ़ा रही है, क्योंकि यह कृष्णा वाटर डिस्प्यूट्स ट्रिब्यूनल-२ (KWDT-II) के फैसले के दायरे से बाहर आता है, और इस पहल के लिए महाराष्ट्र को विश्व बैंक से वित्तीय सहायता कैसे मिल सकती है? मुख्यमंत्री फडणवीस ने महाबलेश्वर के पास कृष्णा का पानी भीमा नदी पर बने उज्जनी बांध में मोड़ने की योजना के बारे में बात की थी। उसका उद्देश्य मराठवाडा के जिलों के साथ-साथ सांगली और सोलापुर जिलों के कुछ हिस्सों को पानी उपलब्ध कराना था। उन्होंने यह दावा भी किया था कि प्रोजेक्ट पर काम पहले ही शुरू हो गया है और विश्व बैंक इसके लिए वित्तीय सहायता प्रदान कर रहा है। मंत्री पाटिल ने इस मुद्दे पर बोलते हुए मुख्यमंत्री फडणवीस की एक वीडियो क्लिप भी दिखाई थी।
मंत्री पाटिल ने बताया कि, इस योजना से अपर कृष्णा सब-बेसिन के भीतर पानी के प्रवाह के पैटर्न में बदलाव होने की संभावना है, जो संभावित रूप से अलमट्टी जलाशय तक पहुंचने वाले पानी की मात्रा को प्रभावित कर सकता है। इससे न केवल कर्नाटक के लिए बल्कि अन्य निचले प्रवाह के राज्यों के लिए भी पानी की उपलब्धता पर प्रस्तावित प्रोजेक्ट के प्रतिकूल प्रभावों के बारे में चिंताएं पैदा होती हैं। मंत्री ने इस बात पर जोर दिया कि पानी के बंटवारे को लेकर ट्रिब्यूनल के फैसले या राज्यों के स्थापित अधिकारों को ध्यान में रखे बिना ऐसे प्रोजेक्ट्स को एकतरफा रूप से हाथ में लेना वह फेडरल सिस्टम के हितों के लिए नुकसानदायक है।
इस मुद्दे पर चर्चा करने के लिए मुख्यमंत्री के नेतृत्व में जल्द ही सर्वदलीय बैठक बुलाई जाएगी, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि ऐसे गंभीर मामलों पर हम एक साथ रहेंगे और राज्य के हितों की रक्षा करने के लिए एक यूनाइटेड, गैर-पक्षपातपूर्ण रुख अपनाया जाएगा। मंत्री पाटिल के अनुसार, हमारी जानकारी के अनुसार महाराष्ट्र सरकार ने इस प्रोजेक्ट के लिए विस्तृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट (DPR) की तैयारी के लिए जुलाई २०२६ में ₹२४ करोड़ मंजूर किए थे। ८४ किमी के पट्टे में जियोलॉजिकल सर्वे करने के लिए तैयारियां चल रही हैं। डीपीआर २०२६ के अंत तक तैयार होने की उम्मीद है और इस प्रोजेक्ट के लिए अनुमानित खर्च लगभग ₹१९,००० करोड़ है।
हालांकि, कृष्णा वाटर डिस्प्यूट्स ट्रिब्यूनल-२ द्वारा दिए गए फैसले और नदी के पानी के आवंटन से जुड़ी कानूनी जिम्मेदारियों के प्रकाश में यह प्रोजेक्ट कई सवाल खड़े करता है। ७५% डिपेंडबिलिटी के आधार पर उपलब्ध २,१३० टीएमसीएफटी पानी के अलावा, ट्रिब्यूनल ने ६५% डिपेंडबिलिटी और औसत उपलब्धता के आधार पर गणना करके ४४८ टीएमसीएफटी अतिरिक्त पानी आवंटित किया है। इस अतिरिक्त पानी में से ८१ टीएमसीएफटी महाराष्ट्र को, १७३ टीएमसीएफटी कर्नाटक को और १९४ टीएमसीएफटी तत्कालीन अविभाजित आंध्र प्रदेश को आवंटित किया गया है। ट्रिब्यूनल के फैसले की धारा XVI के अनुसार, सक्षम प्राधिकारी के पास ३१ मई, २०५० के बाद किसी भी समय पानी के आवंटन के आदेश की समीक्षा करने की या उसमें फेरबदल करने का प्रावधान है, ऐसा मंत्री ने बताया।
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