आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने जमीन मालिकों की अतिरिक्त मुआवजे की मांग ठुकरा दी
वर्ष २००८ में जमीन हस्तगत किए जाने के बावजूद जमीन मालिकों ने २०१० के बाजार भाव के अनुसार मुआवजा मांगा था।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, दोपहर 2:37 · 7 मिनट का पाठ
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द इकोनॉमिक टाइम्स के एक रिपोर्ट के मुताबिक, आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने एक फैसले में कडपा जिले के जमीन मालिकों की अतिरिक्त मुआवजे के लिए दायर अर्जी रद्द कर दी है। कोर्ट ने नोट किया कि जमीन मालिकों ने अपनी दलीलें वर्ष २०१० के बाजार मूल्य प्रमाण पत्रों के आधार पर पेश की थीं, जबकि सरकार ने वास्तव में इस जमीन का कब्जा वर्ष २००८ में ही ले लिया था।
जमीन मालिकों द्वारा अतिरिक्त मुआवजे का दावा दायर करने का मुख्य कारण यह था कि कडपा के रेवेन्यू डिवीजनल ऑफिसर द्वारा जमीन का तय किया गया बाजार मूल्य बहुत कम था और वह सरकार के कुछ मेमोरेंडम (जी.ओ.एम.एस. नं. १३०७ और १३९१) की भावना के खिलाफ था। जमीन मालिकों ने ऐसी दलील दी थी कि उनकी जमीनें शहरी इलाकों में स्थित हैं और सरकार द्वारा तय की गई रकम की तुलना में खुले बाजार में उसका मूल्य काफी अधिक है। दर्ज बुनियादी मूल्य प्रविष्टियों के अनुसार आसपास की जमीनों का मूल्य ३०० रुपये प्रति वर्ग यार्ड होना बताया गया था। इसलिए जमीन मालिकों ने ६०० रुपये प्रति वर्ग यार्ड की दर से मुआवजा हासिल करने का लक्ष्य रखा था और उसके मुताबिक सरकार के सामने अपनी दलीलें पेश की थीं।
यह जमीन डीकेटी पट्टा के रूप में वर्गीकृत की गई थी और यह रिंग रोड के लिए हस्तगत की गई जमीन के करीब थी। संयुक्त कलेक्टर ने जमीन मालिकों की फरियाद सुनने के बाद, सरकारी मेमो दिशानिर्देश (जी.ओ.एम.एस. नं. १३०७, तारीख २३ दिसंबर, १९९३) के अनुसार ३०% सोलेटियम के साथ १.५ लाख रुपये प्रति एकड़ की दर से बाजार मूल्य तय करके एक्स ग्रेसिया भुगतान मंजूर किया था। इससे नाराज होकर जमीन मालिकों ने हाईकोर्ट में केस दायर किया था (डब्ल्यू.पी. नं. १४०९ ऑफ २००८) जिसने संयुक्त कलेक्टर को इस मामले पर फिर से विचार करने का आदेश दिया था।
नं. ८००९ ऑफ २००८) खारिज कर दिया गया था। इसके बावजूद असंतुष्ट रहे जमीन मालिकों ने हाईकोर्ट में एक और केस दायर करके और भी अधिक मुआवजे की मांग की थी।
कोर्ट ने कहा कि सरकार ने इस जमीन को वापस लेने का आदेश २००४ में ही जारी किया था लेकिन जमीन का कब्जा २००८ में लिया था और उसके मुताबिक २००४ के भाव के बदले २००८ के भाव चुकाए थे। २०१० में जब जमीन के भाव में बड़ा उछाल आया, तब जमीन मालिकों ने अधिक मुआवजे का दावा किया। हाईकोर्ट ने भाव बढ़ाने के इस आधार को खारिज कर दिया था।
इन जमीनों की पृष्ठभूमि के संबंध में रिपोर्ट में बताया गया है कि यह डीकेटी (दाराकास्तु) जमीनें थीं जो जमीन मालिकों के पूर्वजों को दी गई थीं। डीकेटी वह सरकारी पड़तर जमीन है जो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में विशेष रूप से खेती या रिहायशी इस्तेमाल के लिए भूमिहीन गरीब लोगों को आवंटित की जाती है। यह डीकेटी जमीन सी.के. दिन्ने के मंडल रेवेन्यू ऑफिसर द्वारा १६ फरवरी, २००२ को जमीन मालिकों के पूर्वजों को दी गई थी। अब जमीन मालिकों ने दावा किया था कि वे इन जमीनों पर खेती कर रहे थे और उसे विकसित कर रहे थे तथा बोर-वेल के पानी से सिंचाई कर रहे थे।
जमीन मालिकों ने आरोप लगाया था कि वे इन जमीनों के निरंतर कब्जे में थे तभी अचानक मंडल रेवेन्यू अधिकारी ने उनका पट्टा आवंटन रद्द कर दिया था और कमजोर वर्गों को रिहायशी मकान के पट्टे मुहैया कराने के लिए ३० जून, २००४ को जमीन पुनरावृत्ति के आदेश जारी किए थे।
आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट के आदेश और चर्चा में जमीन मालिकों ने २०१० के दिशानिर्देश पर भरोसा जताया था जिसने जमीन अधिग्रहण की दर बढ़ाई थी, लेकिन हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि उनकी अपनी जमीन २००८ में हस्तगत की गई थी। हाईकोर्ट ने बताया कि ट्रायल कोर्ट ने २८ सितंबर, २०११ के सब-रजिस्ट्रार द्वारा जारी मूल्यांकन प्रमाण पत्र और जमीन के संबंध में बाजार मूल्य दिशानिर्देश रजिस्टर के दस्तावेजी साक्ष्यों के साथ-साथ अन्य दस्तावेजी और मौखिक साक्ष्यों को ध्यान में लिया था। कोर्ट ने यह अवलोकन किया कि २०१० का दिशानिर्देश १ अगस्त, २०१० से मान्य था, जबकि जमीन मालिकों के मामले में सरकार द्वारा पुनरावृत्ति के आदेश २००४ में जारी किए गए थे।
इस प्रकार हाईकोर्ट ने कहा कि सरकार ने इन जमीनों का कब्जा २००८ में लिया था और दिशानिर्देश १ अगस्त, २०१० से प्रभावी हुआ था। इसलिए हाईकोर्ट ने कहा कि २००८ के वर्ष के लिए जमीन का बाजार मूल्य तय करने के लिए २०१० के दिशानिर्देश पर भरोसा न रखने में ट्रायल कोर्ट वाजिब थी। हाईकोर्ट ने यह भी दोहराया कि आमतौर पर जमीन अधिग्रहण के लिए मुआवजा अधिग्रहण की सूचना जारी किए जाने की तारीख के जमीन के बाजार मूल्य के अनुसार तय किया जाता है।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के एक केस (बर्नार्ड फ्रांसिस जोसेफ वाज बनाम कर्नाटक राज्य - २०२५) का भी जिक्र किया था जिसमें ऐसा कहा गया था कि केवल "अपवादस्वरूप परिस्थितियों में ही" अधिग्रहण मुआवजा अधिग्रहण के लिए सूचना जारी की गई थी उसके बाद की तारीख के जमीन के बाजार मूल्य या कीमत के आधार पर तय किया जा सकता है।
हाईकोर्ट ने यह भी अवलोकन किया कि जमीन अधिग्रहण के लिए मूल सूचना २००४ में ही जारी की गई थी, हालांकि सरकार ने २००८ में कब्जा लिया था और जमीन मालिकों को २००४ की दरों के बजाय २००८ की दरों पर मुआवजा मिला था, इसलिए इस मामले में कोई शिकायत नहीं थी। हाईकोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि २००८ में अन्य बेंच के आदेश का पालन करके संयुक्त कलेक्टर ने बाजार मूल्य के अतिरिक्त १२% ब्याज के साथ वितरित किए थे उसमें कोई विवाद नहीं था।
मुआवजे का निर्धारण २००८ में जारी किए गए आदेशों की शर्तों के अनुसार होने के कारण, विद्वान ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल देने के लिए कोई मामला नहीं बनता है। बाजार मूल्य के निर्धारण में कानून की कोई भूल होने का पता नहीं चला है। आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने इस प्रकार ट्रायल कोर्ट के आदेश को यथावत रखा और और अधिक उन्नत मुआवजे के लिए जमीन मालिकों की अपील ठुकरा दी।
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