सुप्रीम कोर्ट ने चिंबदरम मंदिर के प्रशासन को लेकर मद्रास हाईकोर्ट के आदेश पर रोक लगाई
तमिलनाडु के प्राचीन चिंबदरम सबनायगर मंदिर के प्रशासन के लिए बोर्ड गठित करने के हाईकोर्ट के आदेश को सुप्रीम कोर्ट ने स्थगित कर दिया है।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, रात 9:12 · अपडेट दोपहर 12:16 · 4 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को, तमिलनाडु के प्राचीन चिंबदरम सबनायगर मंदिर के प्रशासन के संबंध में मद्रास हाईकोर्ट द्वारा दिए गए आदेश पर रोक लगा दी है। जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने इस मामले में तमिलनाडु राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है और हाईकोर्ट के 30 अक्टूबर के आदेश के कार्यान्वयन पर तत्काल प्रभाव से रोक लगा दी है।
मद्रास हाईकोर्ट ने पहले एक आदेश दिया था जिसमें मंदिर के प्रशासन के लिए एक मैनेजमेंट बोर्ड (BoM) का गठन किया गया था। हाईकोर्ट का मानना था कि पौधु दीक्षितार, जो कि वंशानुगत पुजारियों का समुदाय है, वे 2014 में सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद से मंदिर का प्रशासन संभाल रहे हैं और तब से उसका कुप्रबंधन कर रहे हैं। कुप्रबंधन के इन आरोपों के कारण हाईकोर्ट ने प्रशासन में बदलाव करने का निर्णय लिया था।
हाईकोर्ट ने इस मैनेजमेंट बोर्ड के अध्यक्ष के रूप में सेवानिवृत्त न्यायाधीश वी. भरतदासन और आर. सुरेश कुमार को नियुक्त किया था। इस बोर्ड के सदस्यों के रूप में सेवानिवृत्त IAS अधिकारी सी. राजेंद्रन को नियुक्त किया गया था। इसके अलावा, पौधु दीक्षितार एसोसिएशन के सचिव और हिंदू धार्मिक और चैरिटेबल एंडोमेंट्स (HR&CE) विभाग के सचिव को पदधारी सदस्यों के रूप में शामिल किया गया था।
हाईकोर्ट ने इस मैनेजमेंट बोर्ड को तमिलनाडु हेरिटेज कमीशन के परामर्श से मंदिर परिसर में किए गए अनधिकृत निर्माणों को हटाने का महत्वपूर्ण कार्य सौंपा था, क्योंकि इन निर्माणों के कारण मंदिर के प्राचीन ढांचे को नुकसान पहुंचा था। इसके अलावा, बोर्ड को जिला प्रशासन की मदद से मंदिर की संपत्तियों पर किए गए अतिक्रमण को हटाकर उन संपत्तियों को वापस पाने की जिम्मेदारी भी सौंपी गई थी।
तमिलनाडु सरकार की ओर से वकील शेखर नाफाडे और जयदीप गुप्ता ने अदालत में दलील दी कि मंदिर की संपत्तियों को गंभीर नुकसान पहुंचाया गया है। उन्होंने आगे बताया कि पौधु दीक्षितार द्वारा पिछले 12 वर्षों के दौरान मंदिर की आय का पूरा हिसाब पेश नहीं किया गया है। नाफाडे ने दलील दी कि कानून के अनुसार देवता को 'ज्यूरिस्टिक पर्सन' माना जाता है और उनके हितों की रक्षा के लिए हाईकोर्ट के पास 'पैरेंस पेट्रीए' (अभिभावक के रूप में) अधिकार क्षेत्र है।
इस बीच सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण कानूनी प्रश्न उठाया कि क्या राज्य हाईकोर्ट के पास केवल सार्वजनिक मंदिरों के लिए ही 'पैरेंस पेट्रीए' अधिकार क्षेत्र है या अन्य धर्मों के उपासना स्थलों के लिए भी यह शक्ति है? इस प्रश्न के संबंध में जस्टिस कुमार ने राज्य सरकार को नोटिस जारी किया है। विपक्षी दल की ओर से वकील साई दीपक ईयर ने दलील दी थी कि अदालत को इस बात पर विचार करना चाहिए कि यह सिद्धांत केवल मंदिरों के लिए ही क्यों लागू होता है। इस मामले में जस्टिस कुमार ने वकील को कोई व्यापक बयान न देने का निर्देश भी दिया था। जयदीप गुप्ता ने बताया कि मुख्य प्रश्न यह है कि क्या मंदिर खतरे में है या नहीं। नाफाडे ने कहा कि यह एक प्रमुख उदाहरण है कि जब मंदिर का प्रशासन वापस सौंपा जाता है तो किस तरह का कुप्रबंधन हो सकता है।
NDTV इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार, सुप्रीम कोर्ट ने दीक्षितारों की अपील पर तमिलनाडु सरकार को नोटिस देते हुए यह भी पूछा कि क्या मंदिर के निर्माण में किए गए बदलावों के लिए उन्हें जिम्मेदार ठहराने के लिए कोई ठोस सबूत उपलब्ध हैं।
चिंबदरम नटराजा मंदिर, जिसे थिल्लई नटराजा मंदिर के रूप में भी जाना जाता है, तमिलनाडु में स्थित एक प्राचीन मंदिर था।
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