मद्रास हाईकोर्ट ने रेलवे के स्लीपिंग बर्थ समय के नियम को बरकरार रखा
रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक ही स्लीपिंग बर्थ का उपयोग किया जा सकेगा
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 12:43 · अपडेट सुबह 12:54 · 4 मिनट का पाठ
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मद्रास हाईकोर्ट ने भारतीय रेलवे के रिजर्व्ड कोच में स्लीपिंग बर्थ के समय से संबंधित नियम पर लगे प्रतिबंध को यथावत रखने का निर्णय लिया है। अदालत ने निर्धारित किया है कि यात्री केवल रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक की अवधि में ही स्लीपिंग बर्थ का उपयोग कर सकेंगे। अदालत ने कहा कि यह नियम कोच में यात्रा करने वाले सभी यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करने के लिए बनाया गया है।
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट भारतीय रेलवे कमर्शियल मैनुअल, वॉल्यूम 1 के पैरा 652(ए) को चुनौती देने वाली एक याचिका पर सुनवाई कर रहा था। मुख्य न्यायाधीश एस.ए. धर्माधिकारी और न्यायमूर्ति जी. अरुल मुरुगन की खंडपीठ ने इस प्रतिबंध लगाने वाले नियम के खिलाफ अपील को खारिज कर दिया। अदालत ने टिप्पणी की कि निर्धारित समय के अतिरिक्त घंटों में सह-यात्रियों द्वारा किसी बीमार व्यक्ति को सुविधा देने से इनकार करने की एक अकेली घटना इस पूरे नियम को रद्द करने के लिए पर्याप्त नहीं है।
अदालत ने स्पष्ट करते हुए कहा, "पैरा 652 के तहत प्रतिबंधों का सभी यात्रियों की सुविधा सुनिश्चित करने के साथ उचित संबंध है। एक अकेली घटना, जिसमें सह-यात्रियों ने अपीलकर्ता की अस्वस्थ पत्नी के लिए सोने के घंटों को बढ़ाने से इनकार कर दिया था, व्यापक जनहित में बनाए गए नियम को अमान्य करने के लिए उचित नहीं है।"
यह अपील चेन्नई निवासी एस. बालसुब्रमण्यन द्वारा दायर की गई थी। उन्होंने दावा किया था कि जब वह अपनी पत्नी के साथ यात्रा कर रहे थे, तब सह-यात्रियों ने उनकी पत्नी के बीमार होने के बावजूद निर्धारित घंटों के बाद स्लीपिंग बर्थ का उपयोग करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। अपीलकर्ता ने कहा कि रेलवे मैनुअल में गर्भवती महिलाओं, दिव्यांग व्यक्तियों और बीमार यात्रियों को उनकी जरूरतों के अनुसार सह-यात्रियों से अनुरोध करने की छूट दी गई है, लेकिन ये सुरक्षात्मक प्रावधान किसी काम नहीं आए।
बालसुब्रमण्यन ने पिछली सिंगल-बेंच के फैसले के खिलाफ भी अपील की थी, जिसने उनकी याचिका को पहले खारिज कर दिया था। खंडपीठ ने नोट किया कि पैरा 652(डी) का उद्देश्य रिजर्व्ड कोच में यात्रा करने वाले सभी यात्रियों की सुविधा के बीच संतुलन बनाए रखना है। इस प्रावधान के तहत, यात्री रात 10 बजे से सुबह 6 बजे तक स्लीपिंग सुविधा का उपयोग कर सकते हैं, जबकि शेष घंटे सीटिंग सुविधा के लिए आरक्षित होते हैं।
अदालत ने समझाया कि यह व्यवस्था यह सुनिश्चित करने के लिए है कि जिन यात्रियों को मिडिल (मध्य) और अपर (ऊपरी) बर्थ आवंटित की गई है, उन्हें दिन के दौरान पर्याप्त बैठने की जगह मिल सके। अदालत ने अवलोकन किया कि इस प्रतिबंध का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि वैध टिकट रखने वाले सभी यात्री अन्य सह-यात्रियों को असुविधा पहुँचाए बिना आराम से यात्रा कर सकें। अदालत ने यह भी नोट किया कि मैनुअल में गर्भवती महिलाओं, दिव्यांगों और बीमार यात्रियों के लिए सुरक्षात्मक प्रावधान शामिल हैं।
हालांकि, हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि यात्री जिन कठिनाइयों का सामना कर रहे हैं, वे रेलवे अधिकारियों से संपर्क कर सकते हैं ताकि मैनुअल के तहत सुरक्षात्मक प्रावधानों का कार्यान्वयन सुनिश्चित किया जा सके। अदालत ने कहा, "हम स्पष्ट करते हैं कि कठिनाई महसूस करने वाले यात्री रेलवे अधिकारियों को इस बारे में सूचित कर सकते हैं, जो यह सुनिश्चित करने के लिए बाध्य हैं कि पैरा 652(डी) के तहत सुरक्षात्मक प्रावधान उचित रूप से लागू हों।"
इसके अलावा, अदालत ने यह भी नोट किया कि जब सह-यात्रियों ने सहयोग करने से इनकार किया, तो अपीलकर्ता रेलवे सुरक्षा बल (RPF) या अन्य रेलवे अधिकारियों के पास जा सकते थे, ताकि निर्धारित सुरक्षात्मक प्रावधानों का लाभ मिल सके। लेकिन, अदालत ने अवलोकन किया कि अपीलकर्ता ने अधिकारियों की मदद लेने के बजाय सीधे इस प्रावधान की वैधता को चुनौती देना चुना।
मिंट की रिपोर्ट के अनुसार, यह पूरा विवाद रेलवे के नियमों के कार्यान्वयन और यात्रियों की व्यक्तिगत जरूरतों के बीच संतुलन पर आधारित था। अदालत के इस फैसले से रेलवे के वर्तमान स्लीपिंग बर्थ समय के नियम यथावत रहेंगे और यात्रियों को निर्धारित समय सीमा का पालन करना होगा।
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