MeitY द्वारा सोशल मीडिया पोस्ट्स पर प्रतिबंध लगाने के आदेश नहीं दिए जा रहे हैं
सरकारी अधिकारी ने स्पष्ट किया कि मंत्रालय टेकडाउन ऑर्डर जारी नहीं कर रहा है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
31 अक्टूबर 2026, रात 10:14 · अपडेट शाम 6:50 · 7 मिनट का पाठ
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इलेक्ट्रॉनिक्स और इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी मंत्रालय (MeitY) सोशल मीडिया पोस्ट्स को हटाने के लिए आदेश (टेकडाउन ऑर्डर) जारी नहीं कर रहा है, ऐसा मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया है। पिछले कुछ हफ्तों के दौरान पत्रकारों, मीडिया संस्थानों, कार्टूनिस्टों और राजनीतिक समीक्षकों ने इंस्टाग्राम, फेसबुक और X पर अपनी पोस्ट्स, वीडियो और अकाउंट्स पर प्रतिबंध आने की शिकायतें की हैं। हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस वरिष्ठ अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि, "हम यह टेकडाउन भेज नहीं रहे हैं। मेटा से पूछिए।"
सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स पर जब किसी कंटेंट को प्रतिबंधित किया जाता है, तब यूज़र्स को अक्सर बहुत कम जानकारी दी जाती है। प्लेटफॉर्म्स द्वारा मिलने वाले नोटिफिकेशन में अक्सर केवल इतना ही लिखा होता है कि सरकार या कानून प्रवर्तन एजेंसियों के अनुरोध के आधार पर भारत में एक्सेस पर प्रतिबंध लगा दिया गया है। कंपनियों द्वारा ऐसे कितने प्रतिबंधित अनुरोधों का पालन किया गया है, इसका कोई एकत्रित डेटा उपलब्ध नहीं है। द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, यूज़र्स को अक्सर "आपकी पोस्ट भारत में उपलब्ध नहीं है" ऐसे संदेश देखने को मिलते हैं, जबकि अन्य मामलों में इन्फॉरमेशन टेक्नोलॉजी (इंटरमीडियरी गाइडलाइंस एंड डिजिटल मीडिया एथिक्स कोड) रूल्स, २०२१ के तहत लागू ऑटोमेटेड सिस्टम द्वारा एक्सेस सीमित होने की बात बताई जाती है।
इस प्रकार के अनुरोध प्लेटफॉर्म तक पहुँचने का मुख्य मार्ग 'सहयोग पोर्टल' माना जाता है। यह पोर्टल केंद्रीय गृह मंत्रालय के तहत आने वाले इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) द्वारा चलाया जाता है, जो सरकारी एजेंसियों और पुलिस के अनुरोधों को ऑनलाइन इंटरमीडियरीज तक पहुँचाता है। इस पोर्टल के आलोचक लंबे समय से ऐसी दलील दे रहे हैं कि यह सरकारी अधिकारियों को औपचारिक ब्लॉकिंग के नियमों के बिना कंटेंट हटाने का आदेश देने की अनुमति देता है। ये अनुरोध IT एक्ट की धारा ७९(३)(b) और IT रूल्स, २०२१ के नियम ३(१)(d) के तहत भेजे जाते हैं, जो प्लेटफॉर्म की जिम्मेदारी और गैरकानूनी कृत्यों के लिए जानकारी के संबंध में उनकी जिम्मेदारियों से संबंधित हैं।
इसके विपरीत, IT एक्ट की धारा ६९A एक मात्र प्रावधान है जिसके तहत MeitY ब्लॉकिंग निर्देश देता है। सुप्रीम कोर्ट ने २०१५ के श्रेया सिंघल फैसले में धारा ६९A को मान्य रखा था क्योंकि इसमें सुरक्षात्मक उपाय शामिल हैं: आदेशों में कारण दर्ज करना आवश्यक है, प्रभावित पक्ष को सुनवाई का अवसर मिलना चाहिए और एक समीक्षा समिति इन निर्णयों की देखरेख करती है। हालांकि, सहयोग नोटिस अलग रास्ते से यात्रा करती है। X (पूर्व में ट्विटर) ने कर्नाटक हाईकोर्ट में चुनौती दिए गए मामले में सहयोग पोर्टल को "सेंसरशिप पोर्टल" के रूप में संबोधित किया था। X ने दलील दी थी कि धारा ७९(३)(b) केवल ऐसे हालात तय करती है जिनमें प्लेटफॉर्म अपनी सुरक्षा खो देता है और यह ब्लॉक करने की कोई शक्ति नहीं देती है। X के दस्तावेजों के अनुसार, गृह, रक्षा, रेलवे और वित्त मंत्रालयों के अधिकारियों के साथ-साथ ३० से अधिक राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों के पुलिस अधिकारियों को इस पोर्टल के माध्यम से नोटिस भेजने के लिए अधिकृत किया गया था।
सरकार की अपनी प्रस्तुतियों में कम से कम एक दुरुपयोग स्वीकार किया गया था। तेलंगाना में रेलवे ट्रैक पर गाड़ी चलाने वाली महिला का वायरल वीडियो हटाने के लिए इंडियन रेलवे द्वारा X को दी गई नोटिस कानूनी शक्तियों की सीमा से बाहर थी, हालांकि सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने इसे "एक अलग घटना" करार दिया था। केंद्र सरकार ने पोर्टल का बचाव करते हुए इसे "शुद्ध प्रशासनिक" साधन बताया है जो "न तो कंटेंट हटाना अनिवार्य बनाता है और न ही जुर्माना लगाता है"। हाईकोर्ट ने भी इस बात पर सहमति जताई थी। सितंबर २०२५ में हाईकोर्ट ने X की याचिका खारिज कर दी थी और पोर्टल को "जनहित का साधन" बताया था, जिसके खिलाफ X ने अपील की है।
सितंबर २०२५ के फैसले के एक महीने बाद, MeitY ने नोटिस कौन भेज सकता है, इस बारे में आलोचनाओं को ध्यान में रखते हुए नियम ३(१)(d) में संशोधन किया था। अब कंटेंट हटाने की जानकारी या नोटिस केंद्र या राज्य में संयुक्त सचिव या समान अधिकारी, अथवा जहाँ संयुक्त सचिव का पद न हो वहाँ निदेशक स्तर के अधिकारी, अथवा पुलिस महानिदेशक (DIG) रैंक के पुलिस अधिकारी द्वारा ही दी जा सकती है। सचिव स्तर के अधिकारी को हर महीने प्रत्येक जानकारी की समीक्षा करनी आवश्यक है। इन सुरक्षात्मक उपायों का परीक्षण अक्टूबर महीने में हुआ था, जब पंजाब और हरियाणा हाईकोर्ट ने मेटा को दी गई २१ अगस्त की नोटिस रद्द कर दी थी, जिसने हरियाणा २४ न्यूज नेटवर्क प्राइवेट लिमिटेड का फेसबुक पेज ब्लॉक कर दिया था। कोर्ट ने पाया था कि नोटिस DIG रैंक से नीचे के अधिकारी द्वारा दी गई थी और अनिवार्य मासिक समीक्षा हुई हो ऐसा भी प्रतीत नहीं हो रहा था। कोर्ट ने यह भी आदेश दिया कि यूज़र्स को भी टेकडाउन नोटिस की प्रति मिलनी चाहिए ताकि वे ब्लॉकिंग को चुनौती दे सकें।
SFLC.in की संस्थापक और टेक्नोलॉजी वकील मिषी चौधरी ने बताया था कि, "भारत अभूतपूर्व पैमाने पर ऑनलाइन टेकडाउन देख रहा है। प्लेटफॉर्म्स ऑटोमेटेड सिस्टम्स या सरकारी अनुरोधों का दोष मढ़ते हैं। अब यदि सरकार ये आदेश नहीं दे रही है, तो कौन दे रहा है? यूज़र्स से यह अपेक्षा नहीं की जा सकती कि वे यह जानने के लिए इस अस्वीकार की भूलभुलैया में फंसे रहें कि उनकी स्पीच किसने सेंसर की, किस आधार पर की और इसे कैसे चुनौती दी जा सकती है। यह अपारदर्शिता जवाबदेही को असंभव बनाती है।"
SFLC.in के फ्री स्पीच ट्रैकर द्वारा पिछले २९ दिनों में कंटेंट और अकाउंट प्रतिबंधों के कुल ३५१ मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से २३ मामले धारा ७९(३)(b) के तहत कानूनी अनुरोधों से जुड़े थे, जबकि ११ मामले IT रूल्स, २०२१ के नियम ४(४) के तहत अनुरोधों से जुड़े थे। पिछले एक महीने में, SFLC की राइट्सलाइन हेल्पलाइन को कंटेंट प्रतिबंधों के २८ मामले मिले हैं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के संस्थापक अपार गुप्ता ने बताया कि, "MeitY ने सेंसरशिप को इतना कार्यक्षम बना दिया है कि उसे अब विशिष्ट आदेश देने की आवश्यकता भी नहीं है। IT रूल्स, २०२१ और उसकी एडवाइजरीज मेटा से यह काम करवा रही हैं। पिछले एक महीने में ही, इंस्टाग्राम यूज़र्स की ओर से अकाउंट और कंटेंट प्रतिबंधों के कारण मदद के लिए ६७ अनुरोध मिले हैं।"
द डेली पुलिस द्वारा पिछले तीन महीनों में लगभग ३०० टेकडाउन अनुरोध जारी किए गए हैं, जिनमें से अधिकांश प्लेटफॉर्म द्वारा स्वीकार कर लिए गए हैं, द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार।
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