वैवाहिक जीवन में प्रताड़ना सहन न करें, बेटी का मायके आना शर्म की बात नहीं
फ्लाइट अटेंडेंट की आत्महत्या के मामले में पति को बरी करते हुए कोर्ट ने माता-पिता को महत्वपूर्ण सलाह दी
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, रात 11:09 · 5 मिनट का पाठ
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में कहा है कि यदि कोई बेटी अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा या प्रताड़ना की शिकायत करती है, तो माता-पिता को उसकी बातों को गंभीरता से लेना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह बचाने के लिए समझौते के नाम पर बेटी को चुप नहीं रखना चाहिए। जस्टिस मधु जैन ने उल्लेख किया कि बेटी का मायके लौटना परिवार के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए, क्योंकि विवाह से अधिक महिला की सुरक्षा और सम्मान महत्वपूर्ण है। कोर्ट ने आगे कहा कि मदद करने के लिए किसी बड़ी दुर्घटना या अनहोनी होने का इंतजार नहीं करना चाहिए।
यह टिप्पणी जस्टिस मधु जैन द्वारा 2018 में फ्लाइट अटेंडेंट अनीसिया बत्रा की आत्महत्या के मामले में की गई थी। 39 वर्षीय अनीसिया जर्मन एयरलाइन में काम करती थी। 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में उसने कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। उसके पति मयंक सिंघवी उसे अस्पताल ले गए थे, जहां डॉक्टरों ने उसे मृत घोषित कर दिया था। इस घटना के बाद अनीसिया की मां नीलम बत्रा ने शिकायत की थी कि मयंक उसकी बेटी को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित करते थे और लगातार पैसों की मांग करते थे। आरोप था कि अनीसिया और उसकी मां के नाम पर स्थित फ्लैट की बिक्री से प्राप्त राशि को लेकर दबाव बनाया जा रहा था।
इस मामले में दिल्ली हाईकोर्ट ने पति मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया है। साथ ही उसके माता-पिता को क्रूरता और दहेज मृत्यु के आरोपों से मुक्त कर दिया है। कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को भी रद्द कर दिया जिसमें मयंक के खिलाफ क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोप तय किए गए थे। कोर्ट ने अवलोकन किया कि यदि आत्महत्या से पहले कोई महिला संदेश में किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराती है, तो केवल वह एक सबूत आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। जिम्मेदारी तय करने के लिए व्यक्ति की सक्रिय और जानबूझकर की गई भूमिका साबित होना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति के सभी रिश्तेदारों को एक साथ क्रूरता के आरोपों में फंसाने की प्रवृत्ति पर गंभीर चिंता व्यक्त की है। कोर्ट ने अपने 52 पन्नों के फैसले में कहा कि केवल पति का रिश्तेदार होने के कारण किसी व्यक्ति को आपराधिक मामले में आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति के खिलाफ विशिष्ट भूमिका या सबूत होना अनिवार्य है। कोर्ट ने कहा कि वैवाहिक तनाव या विवाद अपने आप आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बन जाते। आपराधिक कार्यवाही का प्रभाव व्यक्ति की प्रतिष्ठा, आजीविका और पारिवारिक जीवन पर पड़ता है, इसलिए बिना कारण पति या उसके रिश्तेदारों को सजा नहीं मिलनी चाहिए।
दहेज के संबंध में कोर्ट ने कहा कि विवाह के दौरान पैसों की हर मांग या लेन-देन को दहेज नहीं माना जा सकता। दहेज साबित करने के लिए वह मांग विवाह से जुड़ी होनी चाहिए। इस मामले में 2019 में ट्रायल कोर्ट ने मयंक और उसके माता-पिता को दहेज मृत्यु के आरोपों से मुक्त कर दिया था, जिसे चुनौती दी गई थी। अंततः हाईकोर्ट ने मयंक को सभी आरोपों से मुक्त रखने का निर्णय लिया है।
दूसरी ओर, सुप्रीम कोर्ट ने एक अलग मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि गिरफ्तार व्यक्ति को मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करने की 24 घंटे की संवैधानिक समय सीमा 'औपचारिक गिरफ्तारी' से नहीं, बल्कि 'हिरासत' (detention) के समय से शुरू होती है। कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी और हिरासत के बीच कोई कृत्रिम अंतर नहीं हो सकता। केवल गिरफ्तारी के स्थान से कोर्ट तक पहुंचने के यात्रा समय को इन 24 घंटों से घटाया जा सकता है। पूछताछ, जांच या जब्ती में बिताया गया समय घटाया नहीं जा सकता। यदि किसी व्यक्ति को 24 घंटे बाद भी मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश नहीं किया जाता है, तो उसे तुरंत रिहा किया जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने ओडिशा, मद्रास और केरल हाईकोर्ट के उन विचारों को खारिज कर दिया था जिनमें गिरफ्तारी से पहले की हिरासत के समय को घटाने की छूट दी गई थी।
इसके अलावा, प्रजनन दर पर टिप्पणी करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि दो से अधिक बच्चे होने के कारण चुनाव लड़ने से रोकने वाला कानून अब प्रासंगिक नहीं रहा है। कोर्ट ने जानकारी दी कि भारत की कुल प्रजनन दर 2003 में 3 थी, जो अब घटकर 1.9 हो गई है, जबकि 2.1 की दर को रिप्लेसमेंट रेट माना जाता है। अतः ऐसे कानून पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता है।
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