कर्ता केवल अपने स्वार्थ के लिए संयुक्त HUF भूमि नहीं बेच सकते
सुप्रीम कोर्ट ने निर्धारित किया कि वास्तविक आवश्यकता के बिना केवल एक सदस्य के लाभ के लिए किया गया संपत्ति का हस्तांतरण रद्द माना जाएगा
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
2 नवंबर 2026, सुबह 11:23 · 5 मिनट का पाठ
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हिंदू अविभाजित परिवार (HUF) के मुखिया यानी कर्ता, यदि संयुक्त पूर्वजों की संपत्ति केवल अपने व्यक्तिगत लाभ के लिए बेचने का प्रयास करते हैं, तो परिवार के अन्य सदस्य इसे स्वीकार करने के लिए मजबूर नहीं हैं और वे इस बिक्री को रद्द घोषित कर सकते हैं। सुप्रीम कोर्ट के एक हालिया फैसले में इस महत्वपूर्ण बात को स्पष्ट किया गया है।
सुप्रीम कोर्ट में चले एक मामले में परिवार के मुखिया पर आरोप था कि उन्होंने पूर्वजों की संयुक्त भूमि से प्राप्त धन का उपयोग करके अधिक भूमि खरीदी थी और उसमें से कुछ भूमि अपने छोटे पुत्र को बेच दी थी। जब अन्य भाई बड़े हुए तो उन्होंने इस निर्णय का विरोध किया और अंततः इस मामले में आंशिक विजय प्राप्त की। सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि भूमि के कुछ बिक्री लेनदेन अमान्य थे क्योंकि वह संयुक्त संपत्ति थी जो परिवार की संयुक्त आय से प्राप्त की गई थी। हालांकि, कुछ भूमि छोटे पुत्र को उचित रूप से दी गई थी क्योंकि उसके पिता ने उसे अपने धन से खरीदा था।
सुप्रीम कोर्ट ने अवलोकन किया कि, "वास्तविक आवश्यकता की अनुपस्थिति में एक सह-वारिस (coparcener) के पक्ष में किया गया संपत्ति का हस्तांतरण अन्य सदस्यों के लिए बाध्यकारी नहीं हो सकता है।" इसका अर्थ यह है कि यदि परिवार का कोई एक सदस्य संयुक्त पूर्वजों की संपत्ति का प्रबंधन केवल अपने फायदे के लिए करने का प्रयास करता है, तो अन्य सदस्य उसे स्वीकार करने के लिए बाध्य नहीं हैं और वे अदालत में उसे चुनौती दे सकते हैं। यदि यह लेनदेन परिवार के समग्र हित में या किसी वैध कारण से किया गया है, तभी उसे मान्य माना जाएगा।
सुप्रीम कोर्ट के एडवोकेट ऑन रिकॉर्ड विशाल गेहरा के अनुसार, अदालत का यह अवलोकन हिंदू अविभाजित परिवार की पारंपरिक मिताक्षरा पद्धति और कर्ता की सीमित शक्तियों से उपजा है। गेहरा बताते हैं कि कर्ता संयुक्त संपत्ति के प्रबंधक और संरक्षक हैं, न कि उसके पूर्ण स्वामी। संपत्ति बेचने की उनकी शक्ति सीमित है और वह केवल कानूनी आवश्यकताओं के लिए, संपत्ति के हित में या आवश्यक कर्तव्यों का पालन करने के लिए ही की जा सकती है।
फैसले के पैरा 33 में इस बात पर जोर दिया गया है कि यह आवश्यकता स्पष्ट रूप से सिद्ध होनी चाहिए। बिक्री दस्तावेजों में किए गए अस्पष्ट या व्यापक बयान असहमत सह-वारिसों को बाध्य करने के लिए पर्याप्त नहीं हैं। हिंदू कानून के अनुसार संयुक्त पूर्वजों की संपत्ति बेचने के लिए दो शर्तों का पालन करना आवश्यक है। पहला, संयुक्त संपत्ति बेचने की आवश्यकता वास्तविक होनी चाहिए और यह परिवार के ऋण, चिकित्सा उपचार, आवश्यक भरण-पोषण, आश्रितों के विवाह, संपत्ति के नुकसान को रोकने या संपत्ति के हित में होने वाले लेनदेन तक सीमित होनी चाहिए।
दूसरा, जब संपत्ति के हस्तांतरण को चुनौती दी जाती है, तो जिस व्यक्ति को संपत्ति से वंचित रखा गया है (इस मामले में बड़े भाई) उस पर यह साबित करने की जिम्मेदारी होती है कि या तो वास्तविक आवश्यकता थी या उसने उचित जांच की थी और प्राप्त जानकारी पर समझदारी से काम किया था। गेहरा के अनुसार, जब संपत्ति किसी एक सह-वारिस के पक्ष में बेची जाती है, तो हिंदू सिद्धांत अधिक कड़ाई से लागू होते हैं। इस मामले में पिता ने संयुक्त परिवार की भूमि छोटे पुत्र को बेची थी, जिससे बड़े पुत्र वंचित रह गए थे।
इस मामले में भूमि के 70 से अधिक टुकड़े थे और पिता ने सारी भूमि अपने कोष से नहीं खरीदी थी। अदालत ने लेनदेन और खरीद के रिकॉर्ड के साथ-साथ अन्य साक्ष्यों की जांच की और पिता द्वारा अपने कोष से खरीदी गई भूमि को संयुक्त भूमि से अलग किया। अदालत ने लेनदेन की वस्तुनिष्ठ जांच को अनुमति दी, जिसमें केवल उन्हीं लेनदेन को मान्य माना गया जो आवश्यकता के साक्ष्य द्वारा समर्थित थे और जहां साक्ष्य का अभाव था वहां चुनौती देने वाले सह-वारिस को बाध्य न करने का निर्णय लिया गया।
विशाल गेहरा ने आगे कहा कि, "पुत्र को कर्ता द्वारा किया जाने वाला विक्रय स्वार्थ या गुप्त लेनदेन के प्रति संवेदनशील हो सकता है और इसलिए इसकी अधिक कड़ी जांच की आवश्यकता है।" सरोज झा, जो सराफ एंड पार्टनर्स की सीनियर पार्टनर हैं, ने बताया कि यदि आय उत्पन्न करने वाली पूर्वजों की संपत्ति से प्राप्त आय का उपयोग अन्य संपत्तियां प्राप्त करने के लिए किया जाता है, तो उसका लाभ सभी कानूनी वारिसों को मिलना चाहिए। झा के अनुसार, यदि किसी संपत्ति के स्वामित्व में आय उत्पन्न करने वाली पूर्वजों की संपत्ति से आंशिक कोष और आंशिक रूप से किसी अन्य व्यक्ति द्वारा योगदान दिया गया है, तो पूर्वजों की संपत्ति से प्राप्त योगदान के हिस्से के लिए वह सभी कानूनी वारिसों के हित में रहेगा।
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