आकाश में अदृश्य जंग: ड्रोन को जैमिंग से बचाने वाली एंटी-जैमिंग एंटीना तकनीक का विज्ञान
रूस-यूक्रेन युद्ध में ड्रोन को विफल बनाने वाले इलेक्ट्रॉनिक हमलों से सुरक्षा के लिए अब बड़े और शक्तिशाली एंटी-जैमिंग एंटीना का उपयोग बढ़ रहा है।

आधुनिक युद्धभूमि अब केवल जमीन, समुद्र या आकाश तक सीमित नहीं रही है, बल्कि यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम (electromagnetic spectrum) यानी विद्युतचुंबकीय तरंगों के अदृश्य क्षेत्र में भी फैल गई है। रूस और यूक्रेन के बीच चल रहे संघर्ष में ड्रोन एक निर्णायक हथियार साबित हुए हैं, लेकिन इन ड्रोनों को मार गिराने के लिए अब गोलियों से अधिक इलेक्ट्रॉनिक जैमिंग (jamming) का उपयोग किया जा रहा है। कंपनी की घोषणा और हालिया रिपोर्टों के अनुसार, रूस अपने ड्रोन बेड़े को और अधिक मजबूत बनाने के लिए उनमें बड़े एंटी-जैमिंग एंटीना (anti-jamming antenna) लगा रहा है। ये एंटीना ड्रोन को सैटेलाइट नेविगेशन सिग्नल प्राप्त करने में मदद करते हैं और दुश्मन द्वारा किए जाने वाले इलेक्ट्रॉनिक हस्तक्षेप को विफल करते हैं।
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर (electronic warfare) या इलेक्ट्रोमैग्नेटिक वॉरफेयर एक ऐसी सैन्य रणनीति है जिसमें दुश्मन के ऑपरेशन को रोकने के लिए विद्युतचुंबकीय ऊर्जा का उपयोग किया जाता है। इस तकनीक का मुख्य उद्देश्य दुश्मन को स्पेक्ट्रम का लाभ उठाने से रोकना और अपने बलों के लिए इसके निर्बाध उपयोग को सुनिश्चित करना है। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर हवा, समुद्र, जमीन या अंतरिक्ष में कहीं से भी संचालित किया जा सकता है। यह संचार प्रणालियों, रडार (radar) और अन्य सैन्य संपत्तियों को निशाना बना सकता है। आज के समय में सूचना का वातावरण अधिक जटिल हो गया है, जिसे सैन्य शब्दावली में इलेक्ट्रोमैग्नेटिक एनवायरनमेंट (electromagnetic environment) कहा जाता है।
| विभाग का नाम | मुख्य उद्देश्य | उदाहरण |
|---|---|---|
| इलेक्ट्रॉनिक अटैक (EA) | दुश्मन के सिग्नल को नष्ट या कमजोर करना | रेडियो और रडार जैमिंग |
| इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन (EP) | अपने उपकरणों को जैमिंग से बचाना | एंटी-जैमिंग एंटीना, फ्लेयर्स |
| इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट (ES) | दुश्मन के सिग्नल को खोजना और पहचानना | सिग्नल्स इंटेलिजेंस (SIGINT) |
| विभाग | मुख्य कार्य |
|---|---|
| इलेक्ट्रॉनिक अटैक (Electronic Attack) | दुश्मन के उपकरणों को जैम करना या बेकार बनाना। |
| इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन (Electronic Protection) | अपने उपकरणों को दुश्मन के हमले से सुरक्षित रखना। |
| इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सपोर्ट (Electronic Warfare Support) | दुश्मन की तरंगों को खोजकर उनका स्थान निर्धारित करना। |
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया जा सकता है: इलेक्ट्रॉनिक अटैक (electronic attack), इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन (electronic protection) और इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सपोर्ट (electronic warfare support)। इलेक्ट्रॉनिक अटैक का अर्थ है दुश्मन के उपकरणों को बेकार करने के लिए ऊर्जा का आक्रामक उपयोग करना, जिसे सामान्यतः जैमिंग कहा जाता है। जबकि इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन दुश्मन के ऐसे हमलों के खिलाफ सुरक्षा प्राप्त करने की पद्धति है। एंटी-जैमिंग एंटीना इलेक्ट्रॉनिक प्रोटेक्शन का ही एक हिस्सा है। तीसरा भाग यानी इलेक्ट्रॉनिक सपोर्ट, जिसका उपयोग दुश्मन द्वारा छोड़ी जाने वाली तरंगों को खोजने, पहचानने और उनका स्थान निर्धारित करने के लिए किया जाता है।
जब कोई ड्रोन आकाश में उड़ रहा होता है, तो वह अपने लोकेशन के लिए जीपीएस (GPS) जैसे सैटेलाइट सिग्नल पर निर्भर होता है। जैमिंग के दौरान, दुश्मन उसी फ्रीक्वेंसी पर बहुत शक्तिशाली रेडियो सिग्नल भेजता है, जिसके कारण ड्रोन का असली सिग्नल खो जाता है। यह स्थिति ऐसी है जैसे कोई शांत कमरे में दो व्यक्ति बात कर रहे हों और अचानक कोई बड़ा लाउडस्पीकर चालू कर दे, जिससे असली आवाज सुनाई ही न दे। रूस द्वारा उपयोग किए जाने वाले नए और बड़े एंटी-जैमिंग एंटीना इस अतिरिक्त शोर को फिल्टर करने की क्षमता रखते हैं। वे केवल सैटेलाइट से आने वाले सटीक सिग्नल को ही स्वीकार करते हैं और बाकी जैमिंग सिग्नल को ब्लॉक कर देते हैं।

- सिग्नल फिल्टरिंगएंटीना आकाश में मौजूद सभी रेडियो शोर में से केवल सैटेलाइट के सटीक सिग्नल को अलग करता है।
- जैमिंग ब्लॉकिंगदुश्मन द्वारा भेजे जाने वाले अनावश्यक और शक्तिशाली जैमिंग तरंगों को एंटीना अस्वीकार कर देता है।
- स्थिर नेविगेशनफिल्टर किए गए शुद्ध सिग्नल के कारण ड्रोन अपना सही रास्ता और लोकेशन बनाए रखता है।
इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर का इतिहास काफी पुराना है। इसका सर्वप्रथम दस्तावेजी उपयोग 1899-1902 के दूसरे बोअर युद्ध (Second Boer War) के दौरान हुआ था। ब्रिटिश आर्मी ने बादलों पर मोर्स कोड सिग्नल भेजने के लिए सर्चलाइट का उपयोग किया था, जिसे बोअर्स ने अपनी सर्चलाइट से जैम करने का प्रयास किया था। विंस्टन चर्चिल ने अपनी पुस्तक में इस घटना का वर्णन किया है। इसके बाद 1904-1905 के रूसी-जापानी युद्ध में भी रेडियो जैमिंग के प्रयास हुए थे। एक रूसी रेडियो ऑपरेटर ने जापानी युद्धपोतों के बीच होने वाले संवाद को रोकने के लिए अपने स्पार्क-गैप ट्रांसमीटर का उपयोग किया था, जिसके कारण जापानी बलों को पीछे हटना पड़ा था।
आधुनिक समय में इज़रायल एयरोस्पेस इंडस्ट्रीज ने 'स्कोर्पियस' (Scorpius) नामक नई प्रणाली विकसित की है। नवंबर 2021 में घोषित की गई यह प्रणाली एक साथ अनेक जहाजों, ड्रोन और मिसाइलों के रडार और कम्युनिकेशन को बाधित कर सकती है। हाल ही में 8 सितंबर 2024 को, रूसी ड्रोन रोमानिया और लातविया के हवाई क्षेत्र में प्रवेश कर गए थे। यूक्रेन के इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर के कारण रूस के अनेक 'शाहेद' (Shahed) ड्रोन और 'Kh-58' मिसाइलें अपने लक्ष्य तक पहुँचने में विफल रही हैं। यह दर्शाता है कि जैमिंग टेक्नोलॉजी कितनी प्रभावी हो रही है और उससे सुरक्षा प्राप्त करना कितना अनिवार्य है।
- सिग्नल रिसेप्शनएंटीना आसपास के सभी रेडियो तरंगों और सैटेलाइट सिग्नल को ग्रहण करता है।
- जैमिंग की पहचानसिस्टम तय करता है कि कौन सी तरंगें असली हैं और कौन सी दुश्मन द्वारा भेजा गया बेकार शोर है।
- फिल्टरिंग और नलिफिकेशनखास एल्गोरिदम का उपयोग करके जैमिंग सिग्नल को ब्लॉक किया जाता है या उसका प्रभाव शून्य किया जाता है।
- शुद्ध डेटा का उपयोगकेवल सही नेविगेशन सिग्नल को ड्रोन के कंप्यूटर तक भेजा जाता है ताकि वह रास्ता न भटके।
एंटी-जैमिंग एंटीना न केवल आकार में बड़े होते हैं, बल्कि उनकी आंतरिक संरचना भी जटिल होती है। इसमें स्प्रेड स्पेक्ट्रम (spread spectrum) टेक्नोलॉजी का उपयोग किया जाता है, जो सिग्नल को विशाल बैंडविड्थ पर फैला देती है ताकि उसे जैम करना मुश्किल हो जाए। इसके अलावा, लो ऑब्जर्वेबिलिटी (low observability) या स्टील्थ टेक्नोलॉजी का भी उपयोग किया जाता है ताकि ड्रोन स्वयं दुश्मन के रडार में न पकड़े जाएँ। नाटो (NATO) के 2007 के दस्तावेजों के अनुसार, इलेक्ट्रोमैग्नेटिक क्षेत्र को अब एक अलग युद्धक्षेत्र के रूप में देखा जाता है, जैसे कि जमीन या हवाई क्षेत्र होते हैं।
सामान्य नागरिकों के लिए यह टेक्नोलॉजी शायद दूर की बात लगे, लेकिन हमारे दैनिक जीवन में उपयोग होने वाले मोबाइल नेटवर्क और वाई-फाई भी इन्हीं सिद्धांतों पर काम करते हैं। यदि सैन्य क्षेत्र में एंटी-जैमिंग टेक्नोलॉजी विकसित होती है, तो भविष्य में नागरिक संचार प्रणालियाँ भी अधिक सुरक्षित बनेंगी। भारत जैसे देश के लिए, जो अपनी सीमाओं पर ड्रोन द्वारा होने वाली घुसपैठ का सामना कर रहा है, ऐसी टेक्नोलॉजी विकसित करना और समझना अत्यंत आवश्यक है। आकाश में लड़ा जाने वाला यह अदृश्य युद्ध आने वाले समय में तय करेगा कि कौन सा देश टेक्नोलॉजी की दृष्टि से अधिक सक्षम है।




