भारत की नई हाइपरसोनिक शक्ति: 3,500 किमी दूर दुश्मन जहाजों का काल बनेगी DRDO की यह मिसाइल
डिफेंस रिसर्च एंड डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (DRDO) अपनी लॉन्ग-रेंज एंटी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल की रेंज बढ़ाकर हिंद महासागर में भारत का वर्चस्व मजबूत कर रहा है।
भारत की रक्षा क्षमता में एक नया अध्याय जुड़ने जा रहा है। रक्षा अनुसंधान और विकास संगठन यानी DRDO (Defence Research and Development Organisation) भारत की स्वदेशी लॉन्ग-रेन्ज एण्टी-शिप हाइपरसोनिक मिसाइल (LR-ASHM) की क्षमता में बड़ा इजाफा करने की तैयारी कर रहा है। यह मिसाइल अब तक १,५०० किलोमीटर की मारक क्षमता साबित कर चुकी है, लेकिन अब वैज्ञानिक इसे ३,५०० किलोमीटर तक ले जाने की दिशा में काम कर रहे हैं। यह विकास भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद अहम है, क्योंकि यह हिन्द महासागर क्षेत्र में चीन और पाकिस्तान जैसे पड़ोसी देशों की नौसेना की हलचल पर लगाम कसने में मदद करेगा।
हाइपरसोनिक मिसाइल यानी ऐसी मिसाइल जो आवाज की गति से पांच गुनी या उससे अधिक रफ्तार से उड़ सकती है। इस गति को विज्ञान की भाषा में 'मैक ५' (Mach 5) कहा जाता है। DRDO की यह नई मिसाइल न सिर्फ तेज है, बल्कि यह हवा में ही अपना रास्ता बदलने की क्षमता भी रखती है। यह खासियत इसे दुश्मन के रडार और मिसाइल डिफेंस सिस्टम के लिए लगभग अजेय बनाती है। कंपनी की घोषणा और मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, इस मिसाइल के आगामी दो से तीन परीक्षणों के बाद २०२८-२९ तक यह उत्पादन चरण में प्रवेश कर सकती है।
DRDO का इतिहास भारत की आत्मनिर्भरता से जुड़ा है। १९५८ में स्थापित यह संस्था आज ५२ प्रयोगशालाओं का नेटवर्क रखती है। शुरुआती वर्षों में 'प्रोजेक्ट इंडिगो' और 'प्रोजेक्ट डेविल' जैसे मिसाइल कार्यक्रमों के जरिए भारत ने नींव रखी थी। आज DRDO २.० रणनीति के तहत भारत पारंपरिक हथियारों से आगे बढ़कर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और हाइपरसोनिक टेक्नोलॉजी पर ध्यान केंद्रित कर रहा है। LR-ASHM इस नई पीढ़ी के शस्त्रों का बेहतरीन उदाहरण है, जो भारत को दुनिया के गिने-चुने देशों की कतार में ला खड़ा करेगा।
बूस्ट-ग्लाइड टेक्नोलॉजी: यह मिसाइल कैसे काम करती है?
LR-ASHM एक 'बूस्ट-ग्लाइड' (boost-glide) हाइपरसोनिक मिसाइल है। इस टेक्नोलॉजी में मिसाइल को शुरुआत में एक शक्तिशाली रॉकेट बूस्टर द्वारा वातावरण की ऊपरी सतह पर भेजा जाता है। एक बार जरूरी ऊंचाई और गति प्राप्त हो जाने के बाद, मिसाइल का ऊपर का हिस्सा यानी 'हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल' (HGV) अलग हो जाता है। यह हिस्सा इंजन के बिना भी हवा की लिफ्ट का उपयोग करके अत्यधिक गति से ग्लाइड करता है और लक्ष्य की तरफ आगे बढ़ता है।
| विवरण | मानदंड |
|---|---|
| अधिकतम गति | १२,३४८ किमी/घंटा (मैक १० अंदाजे) |
| औसत गति | ६,१७४ किमी/घंटा (मैक ५) |
| नई रेंज | ३,५०० किलोमीटर |
| टेक्नोलॉजी | बूस्ट-ग्लाइड हाइपरसोसिक |
| बूस्टर इंजन | K-४ सॉलिड फ्यूल रॉकेट |

यह प्रक्रिया बैलिस्टिक मिसाइल से अलग है। बैलिस्टिक मिसाइल अंतरिक्ष में जाकर एक निश्चित परवलय (parabolic) मार्ग से नीचे आती है, जिसकी भविष्यवाणी दुश्मन कर सकता है। लेकिन हाइपरसोनिक ग्लाइड व्हीकल वातावरण के अंदर ही रहकर सर्पाकार या जिग-जैग गति कर सकता है। इसे 'मैन्यूवरेबिलिटी' (maneuverability) कहते हैं। इस वजह से दुश्मन का रडार इसे ट्रैक तो कर सकता है, लेकिन यह कहां गिरेगी इसकी सटीक गणना नहीं कर सकता है।
- लॉन्च और बूस्टसॉलिड रॉकेट बूस्टर मिसाइल को वायुमंडल के ऊपरी स्तर पर अत्यधिक गति से ले जाता है।
- अलगावआवश्यक ऊंचाई पर पहुंचने के बाद ग्लाइड व्हीकल बूस्टर से अलग हो जाता है।
- हाइपरसोनिक ग्लाइडमिसाइल वातावरण में वापस लौटती है और हवा की लिफ्ट का उपयोग करके मैक ५+ की गति से ग्लाइड करती है।
- मनोवरिंगलक्ष्य की ओर आगे बढ़ते समय मिसाइल रडार को चकमा देने के लिए अपना रास्ता बदलती है।
- सटीक प्रहारअंतिम चरण में सेंसर्स की मदद से वह दुश्मन के चलते जहाज पर प्रहार करती है।
जब कोई वस्तु आवाज से पांच से दस गुना गति से हवा में गति करती है, तो उसकी आसपास की हवा अत्यधिक गर्म हो जाती है। यह गर्मी इतनी अधिक होती है कि हवा के अणु टूट जाते हैं और गैस 'प्लाज्मा' (plasma) में बदल जाती है। प्लाज्मा पदार्थ की चौथी अवस्था है जो बिजली का वहन कर सकती है। यह प्लाज्मा स्तर मिसाइल के चारों ओर एक आवरण जैसा बनाता है, जो कभी-कभी संचार में बाधा पैदा कर सकता है, लेकिन यह मिसाइल को रडार से छिपाने में भी मदद करता है।
तकनीकी विवरण और गति के आंकड़े
LR-ASHM की गति वास्तव में आश्चर्यजनक है। रिपोर्टों के अनुसार, इसकी अधिकतम गति 12,348 किलोमीटर प्रति घंटा तक पहुंच सकती है। इसकी औसत गति 6,174 किलोमीटर प्रति घंटा के आसपास रहती है। इतनी गति से यह मिसाइल हजारों किलोमीटर की दूरी मिनटों में तय कर सकती है। इस मिसाइल के बूस्टर चरण के लिए भारत की प्रसिद्ध K-4 सबमरीन-लॉन्च्ड बैलिस्टिक मिसाइल (SLBM) की तकनीक का उपयोग किया गया है। K-4 खुद 3,500 किलोमीटर की रेंज रखती है, इसलिए LR-ASHM की रेंज बढ़ाने के लिए किसी बड़े हार्डवेयर बदलाव की आवश्यकता नहीं है।

रेंज बढ़ाने के लिए मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर अपग्रेड और नई 'ट्रेजेक्टरी प्रोफाइल' (trajectory profile) यानी उड़ान के मार्ग में बदलाव किया जाएगा। इस मिसाइल में स्वदेशी सेंसर्स लगाए गए हैं जो टर्मिनल फेज (terminal phase) यानी हमले के अंतिम चरण में चल रहे जहाजों को भी सटीक रूप से खोज सकते हैं। यह मिसाइल स्थिर लक्ष्यों के अलावा समुद्र में गति कर रहे विमान वाहकतपोत जैसे बड़े युद्धपोतों को भी निशाना बना सकती है।

वैश्विक स्तर पर देखें तो, केवल रूस, चीन और अमेरिका जैसे देश ही हाइपरसोनिक तकनीक में आगे हैं। रूस ने यूक्रेन युद्ध में अपनी 'जिरकोन' (Zircon) जैसी मिसाइलों का उपयोग किए जाने की रिपोर्टें दी हैं। चीन के पास DF-17 जैसी हाइपरसोनिक मिसाइलें हैं। भारत की यह 3,500 किमी की रेंज वाली मिसाइल चीन के समुद्री वर्चस्व को सीधा चुनौती देगी। यह ब्रह्मोस (BrahMos) जैसी सुपरसोनिक मिसाइलों के साथ मिलकर भारत को बहुस्तरीय सुरक्षा कवच प्रदान करेगी।
रणनीतिक महत्व: हिंद महासागर में भारत का कवच
3,500 किलोमीटर की रेंज मिलने से भारत की 'मैरीटाइम डिनायल' (maritime denial) क्षमता में अभूतपूर्व वृद्धि होगी। इसका अर्थ यह है कि भारत अपने तटों से हजारों किलोमीटर दूर दुश्मन के युद्धपोतों या विमान वाहकतपोत समूहों को प्रवेश करने से रोक सकेगा। हिंद महासागर क्षेत्र में भारत की रणनीतिक पकड़ मजबूत होगी। DRDO ने इस प्रणाली को थल सेना और वायु सेना के लिए भी प्रस्तावित किया है, जिसका अर्थ है कि भविष्य में यह मिसाइल जमीन पर मौजूद लक्ष्यों को भी निशाना बना सकेगी।

इस मिसाइल के सफल परीक्षण २०२३ और २०२४ में हो चुके हैं, जिसमें १,५०० किमी की रेंज पर सटीक निशाना साधा गया था। मई २०२६ में भी एक महत्वपूर्ण परीक्षण सफल रहा था। अब जब भारत ३,५०० किमी की रेंज की ओर आगे बढ़ रहा है, तब यह रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भर भारत का एक बड़ा उदाहरण बनेगा। यह मिसाइल केवल एक हथियार नहीं है, बल्कि यह भारत की वैज्ञानिक प्रगति और क्षेत्रीय सुरक्षा बनाए रखने की दृढ़ता का प्रतीक है।
हालांकि, हाइपरसोनिक हथियारों के विकास में अभी भी कई चुनौतियाँ हैं। अत्यधिक गर्मी को सहन कर सकने वाली सामग्रियाँ और प्लाज्मा आवरण के बीच भी काम कर सकने वाली संचार प्रणाली विकसित करना वैज्ञानिकों के लिए निरंतर शोध का विषय है। DRDO के सूत्रों के अनुसार, आगामी वर्षों में होने वाले परीक्षण इन सभी पहलुओं को और अधिक मजबूत बनाएंगे। २०२८ तक जब यह मिसाइल भारतीय सेना के शस्त्रागार में शामिल होगी, तब यह दक्षिण एशिया के सुरक्षा समीकरणों को हमेशा के लिए बदल देगी।


