रक्षा क्षेत्र में भारत की आत्मनिर्भरता: नाविक (NavIC) उपग्रह मिशन और स्वदेशी नेविगेशन तकनीक में लंबी छलांग
जीपीएस पर निर्भरता कम करते हुए भारत ने सैन्य टैंकों, मिसाइलों और नेविगेशन उपग्रहों के लिए स्वदेशी तकनीक विकसित कर सुरक्षा चक्र को मजबूत किया है।

भारतीय रक्षा बलों के लिए अंतरिक्ष और ग्राउंड नेविगेशन के क्षेत्र में स्वदेशी तकनीक का उपयोग एक नया मोड़ ले रहा है। भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा पृथ्वी की कक्षा में भेजे गए NVS-03 सैटेलाइट और चंडीगढ़ ऑर्डनेंस फैक्ट्री में निर्मित इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (Inertial Navigation System - INS) भारतीय सेना को युद्ध के मैदान में नई शक्ति प्रदान कर रहे हैं। विशेष रूप से GSLV-F18 रॉकेट द्वारा NVS-03 के सफल प्रक्षेपण के बाद भारत की अपनी स्थानीय नेविगेशन प्रणाली 'नाविक' (NavIC) की क्षमताओं में बड़ी वृद्धि हुई है। अमर उजाला रिसर्च की रिपोर्ट के अनुसार, इस विकास से भारतीय सैन्य बलों को युद्ध और आपातकाल के समय किसी भी विदेशी प्रणाली पर निर्भर रहे बिना सटीक डेटा मिल सकेगा।
दूसरी ओर, रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत इंडियन ऑप्टिकल लिमिटेड और फ्रांस की साफरान इलेक्ट्रॉनिक्स एंड डिफेंस (Safran Electronics & Defense) के बीच हुए तकनीकी सहयोग से ऑर्डनेंस फैक्ट्री चंडीगढ़ में INS सिग्मा-30N (INS Sigma-30N) का स्थानीय निर्माण शुरू हुआ है। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, 22 दिसंबर 2025 को हुए समझौता ज्ञापन के बाद अब तक 24 INS इकाइयां तैयार कर ली गई हैं और इसकी पहली खेप सूरत स्थित अत्याधुनिक रक्षा उत्पादन इकाई को भेजी गई है। इस समझौते के तहत अगले 15 वर्षों तक इस प्रणाली के उत्पादन का विशेष अधिकार चंडीगढ़ फैक्ट्री के पास रहेगा, जिससे विदेशी आयात पर निर्भरता समाप्त हो जाएगी।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: 1999 का कारगिल युद्ध और स्वदेशी तकनीक की आवश्यकता
भारत के लिए स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम बनाने की आवश्यकता 1999 के कारगिल युद्ध के दौरान उत्पन्न हुई थी। उस समय भारतीय सेना को कारगिल क्षेत्र के भौगोलिक स्थान का सटीक डेटा प्राप्त करने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका की ग्लोबल पोजिशनिंग सिस्टम (Global Positioning System - GPS) का उपयोग करना था, लेकिन अमेरिका ने भारतीय बलों को यह डेटा देने से इनकार कर दिया था। उस समय भारतीय वायुसेना के पायलटों को प्रशासनिक और युद्ध अभियानों के लिए कॉकपिट में सामान्य कमर्शियल जीपीएस उपकरणों को फिट करके लक्ष्यों पर हमला करना पड़ा था। इस अनुभव से सबक लेते हुए मई 2006 में भारत सरकार ने अपनी स्वदेशी नेविगेशन प्रणाली बनाने की योजना को मंजूरी दी थी।
इसरो द्वारा शुरू की गई इस परियोजना को पहले इंडियन रीजनल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (IRNSS) नाम दिया गया था, जो बाद में 'नाविक' (Navigation with Indian Constellation - NavIC) के रूप में जानी गई। नाविक सिस्टम भारत की मुख्य भौगोलिक सीमा और उसके आसपास के 1,500 किलोमीटर के क्षेत्र में अत्यंत सटीक रियल-टाइम पोजिशनिंग, वेलोसिटी और टाइमिंग (PVT) सेवाएं प्रदान करती है। योजना के अनुसार भविष्य में इस क्षमता को 3,000 किलोमीटर तक विस्तारित करने का लक्ष्य है, जिसमें 10 से 20 मीटर की स्थान सटीकता और 40 नैनोसेकंड की समय सटीकता प्राप्त होती है।

नाविक सिस्टम की कार्यप्रणाली और तकनीकी ढांचा
उपग्रह आधारित नेविगेशन प्रणाली मुख्य रूप से दो प्रकार की सेवाएं प्रदान करती है: पहली स्टैंडर्ड पोजिशनिंग सर्विस (Standard Positioning Service - SPS), जो सामान्य नागरिकों के लिए खुली है और अन्य ग्लोबल नेविगेशन सैटेलाइट सिस्टम (GNSS) के साथ संगत है; और दूसरी रिस्ट्रिक्टेड सर्विस (Restricted Service - RS), जो सैन्य और अधिकृत उपयोगकर्ताओं के लिए एन्क्रिप्टेड लिंक के माध्यम से सुरक्षित रखी जाती है। ये सेवाएं L1 (1575.42 MHz), L5 (1176.45 MHz) और S-बैंड (2498.028 MHz) फ्रीक्वेंसी पर काम करती हैं।
नेविगेशन सैटेलाइट की सबसे महत्वपूर्ण कड़ी इसके भीतर लगी एटॉमिक क्लॉक (atomic clock) होती है। एटॉमिक क्लॉक समय की छोटी से छोटी गणना भी अत्यंत सटीकता से करती है, जिससे सैटेलाइट और जमीन पर स्थित रिसीवर के बीच की दूरी निर्धारित की जाती है। पहली पीढ़ी के IRNSS उपग्रहों में विदेशी कंपनी द्वारा प्रदान की गई रूबिडियम स्पेस क्लॉक्स (Rubidium Space Clocks) लगाई गई थीं। लेकिन समय के साथ कुछ एटॉमिक क्लॉक में तकनीकी खराबी आने के कारण इसरो ने स्पेस एप्लिकेशन सेंटर (SAC), अहमदाबाद में अपनी स्वदेशी रूबिडियम एटॉमिक क्लॉक विकसित की। NVS श्रृंखला के नई-पीढ़ी के सैटेलाइट्स (जैसे NVS-01 और NVS-03) में इन स्वदेशी एटॉमिक क्लॉक्स का उपयोग किया गया है, जिससे उपग्रहों की आयु 10 वर्ष से बढ़कर 12 वर्ष हो गई है।
- 1. प्रारंभिक पोजीशन सेटअपसिस्टम चालू करते समय टैंक या मिसाइल का प्रारंभिक भौगोलिक स्थान (अक्षांश और देशांतर) दर्ज किया जाता है।
- 2. मोशन और रोटेशन मापनअंदर लगे एक्सेलेरोमीटर त्वरण मापते हैं और जाइरोस्कोप कोणीय परिभ्रमण (झुकाव और दिशा) लगातार दर्ज करते हैं।
- 3. स्वदेशी माइक्रोप्रोसेसिंगअजीत या समान स्थानीय प्रोसेसर द्वारा मापे गए डेटा की गणना करके वाहन के रियल-टाइम वेग और दिशा की गणना होती है।
- 4. सटीक लोकेशन आउटपुटसैटेलाइट जैमिंग के बीच भी सिस्टम मिसाइल या टैंक को उसके सटीक लक्ष्य तक पहुंचाता है।
सैन्य हार्डवेयर और आईएनएस तकनीक का स्वदेशीकरण
अंतरिक्ष में सैटेलाइट नेविगेशन के अलावा जमीन पर सैन्य टैंकों, तोपों और मिसाइलों को सटीक दिशा देने के लिए इनर्शियल नेविगेशन सिस्टम (INS) अत्यंत महत्वपूर्ण है। आईएनएस एक ऐसी प्रणाली है जो सैटेलाइट सिग्नल या बाहरी किसी रेडियो सिग्नल के बिना केवल अपने आंतरिक मोशन सेंसर (जायरोस्कोप और एक्सेलेरोमीटर) की मदद से वाहन या मिसाइल के स्थान, दिशा और गति की गणना करती है। युद्ध के दौरान जब दुश्मन देश सैटेलाइट सिग्नलों को जैम (jamming) कर देते हैं, तब INS सिस्टम सेना के लिए वरदान साबित होता है।
ऑर्डनेंस फैक्ट्री चंडीगढ़ में तैयार हो रही आईएनएस सिग्मा-30 एन प्रणाली फ्रेंच टेक्नोलॉजी ट्रांसफर के तहत भारत में ही बनाई जा रही है। इसके अलावा, आईआईटी बॉम्बे (IIT Bombay) द्वारा विकसित अजीत (AJIT) माइक्रोप्रोसेसर और DRDO के टेक्नोलॉजी डेवलपमेंट फंड के तहत एकॉर्ड सॉफ्टवेयर द्वारा निर्मित नेविगेशन चिपसेट भारतीय सेना के रिसीवरों को स्वदेशी समय और स्थान डेटा प्रदान करते हैं। क्वालकॉम (Qualcomm) जैसी वैश्विक चिप निर्माता कंपनियों ने भी अपने प्रोसेसर में नाविक L1 और L5 सिग्नल का सपोर्ट जोड़ा है।
₹ કરોડ
प्रोजेक्ट की लागत, बजट और तुलना
नाविक प्रोजेक्ट की शुरुआत में इसरो ने कुल खर्च ₹1,420 करोड़ आंका था। इसमें ₹300 करोड़ ग्राउंड सेगमेंट के लिए, प्रति सैटेलाइट ₹150 करोड़ और प्रत्येक PSLV-XL रॉकेट लॉन्च के लिए ₹130 करोड़ शामिल थे। लेकिन अतिरिक्त रिप्लेसमेंट उपग्रहों और कक्षा सुधार मिशनों के कारण, कंप्ट्रोलर एंड ऑडिटर जनरल (CAG) की मार्च 2017 की रिपोर्ट के अनुसार इस प्रोजेक्ट का कुल खर्च बढ़कर ₹2,246 करोड़ (लगभग 233 मिलियन डॉलर) हो गया था।

अमेरिका की जीपीएस (GPS), यूरोप की गैलीलियो (Galileo) और रूस की ग्लोनास (GLONASS) जैसी वैश्विक प्रणालियों की तुलना में भारत की नाविक सिस्टम क्षेत्रीय (regional) होने के बावजूद भारतीय उपमहाद्वीप पर अधिक सटीकता प्रदान करती है। यूनाइटेड स्टेट्स कांग्रेस ने अपने नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन एक्ट 2020 के तहत नाविक को अपने मित्र राष्ट्रों की नेविगेशन सिस्टम के रूप में मान्यता भी दी है।
भविष्य की योजनाएं और चुनौतियां
भारत सरकार ने 2019 से सभी कमर्शियल वाहनों में AIS 140 मानकों के अनुसार नाविक आधारित वाहनों की ट्रैकिंग अनिवार्य बना दी है। इसके अलावा, नेशनल फिजिकल लैबोरेटरी (NPL) में भारतीय मानक समय (IST) के संदर्भ के लिए जीपीएस के बजाय नाविक का उपयोग करने की योजना बनाई गई है। हालांकि, पहली पीढ़ी के कुछ उपग्रहों में परमाणु घड़ियों के विफल होने से सेवाओं में आंशिक बाधा आई थी, लेकिन इसरो द्वारा किए गए NVS श्रृंखला के लॉन्चिंग से यह समस्या हल हो रही है।
स्वदेशी नेविगेशन सॉल्यूशंस से भारत अब रक्षा क्षेत्र में स्वतंत्र बन रहा है। युद्ध क्षेत्र में स्मार्ट गोला-बारूद, ड्रोन और लंबी दूरी की मिसाइलों के लिए सटीक स्थान जानकारी देने के लिए नाविक और आईएनएस का मिश्रण भारतीय सेना को अद्वितीय सुरक्षा कवच प्रदान करता है। भारत की यह तकनीकी क्रांति 'आत्मनिर्भर भारत' विजन को सही अर्थों में साकार कर रही है।


