केंद्र सरकार का खनिज कराधान में समानता लाने का प्रस्ताव, राज्यों के अधिकार सुरक्षित रहेंगे
खनन मंत्रियों के सम्मेलन में केंद्रीय खनन सचिव ने एमएमडीआर एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों के बारे में दी जानकारी
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 2:08 · 4 मिनट का पाठ
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हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, केंद्र सरकार खान और खनिज अधिनियम यानी एमएमडीआर एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों के माध्यम से विभिन्न राज्यों में खनिज कराधान और उत्पादन लागत में अधिक समानता लाने का प्रयास कर रही है, लेकिन साथ ही राज्यों के टैक्स और सेस वसूलने के अधिकार बरकरार रखे जाएंगे। दक्षिण गोवा के पणजी में खनन और कोयला क्षेत्र में सुधारों पर आयोजित खनन मंत्रियों के सम्मेलन को संबोधित करते हुए वरिष्ठ आईएएस अधिकारी और केंद्रीय खनन सचिव केशव चंद्रा ने यह बात कही।
इस बैठक में केंद्रीय खनन मंत्री जी किशन रेड्डी, गोवा के मुख्यमंत्री प्रमोद सावंत और खनन राज्य मंत्री सतीश चंद्र दुबे भी उपस्थित थे। केशव चंद्रा ने कहा कि देश को आयात पर निर्भरता और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इससे होने वाले नुकसान से बचने के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की खोज, प्रसंस्करण और उनसे बनने वाली वस्तुओं के उत्पादन के लिए अपनी घरेलू क्षमता को मजबूत करने की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि लिथियम, निकल और दुर्लभ पृथ्वी तत्वों जैसे महत्वपूर्ण खनिजों की उपलब्धता बैटरी और परमानेंट मैग्नेट के उत्पादन के लिए अत्यंत आवश्यक है।
आत्मनिर्भरता की दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाए जा रहे हैं, यह बताते हुए उन्होंने कहा कि लिथियम और निकल प्रसंस्करण सुविधाएं स्थापित करने के लिए आगे आने वाले उद्योगों को सरकार द्वारा भारी सब्सिडी दी जा रही है। इसके अलावा, इलेक्ट्रॉनिक कचरे और ब्लैक मास के पुनर्चक्रण को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने ₹1,500 करोड़ के वित्तीय प्रावधान के साथ एक योजना शुरू की है। इस योजना के तहत लगभग 58 रीसाइक्लिंग इकाइयां पंजीकृत हैं, जिन्होंने शुरुआती अनुमानित 270 केटीपीए के मुकाबले 850 केटीपीए की संयुक्त प्रसंस्करण क्षमता का वादा किया है। खनन सचिव ने विश्वास व्यक्त किया कि अगले तीन से चार वर्षों में भारत बैटरी और परमानेंट मैग्नेट बनाने के लिए पर्याप्त मात्रा में महत्वपूर्ण खनिजों और अन्य आवश्यक सामग्रियों का उत्पादन करने में सक्षम हो जाएगा।
एमएमडीआर एक्ट में प्रस्तावित संशोधनों के पीछे के तर्क को समझाते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि पड़ोसी राज्यों के बीच खनिज उत्पादन लागत और कराधान में बड़ा अंतर उद्योगों पर विपरीत प्रभाव डाल सकता है और अनुकूल शर्तों वाले राज्यों की ओर आर्थिक गतिविधियों के स्थानांतरण को प्रेरित कर सकता है। बॉक्साइट का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि यह स्थिति आपूर्ति से संबंधित चुनौतियां पैदा कर सकती है और देश में खनिज उपलब्ध होने के बावजूद आयात को बढ़ावा दे सकती है। सभी खनिजों पर विशिष्ट सेस और टैक्स लगाने में आर्थिक तर्क होना चाहिए और इसमें समानता होना अनिवार्य है।
खनन सचिव ने जोर देकर कहा कि प्रस्तावित संशोधनों से राज्यों के अधिकारों पर कोई आंच नहीं आएगी और वे टैक्स तथा सेस वसूलने की शक्ति बनाए रखेंगे। खनन गतिविधियों से पैदा होने वाली आय में से 92 से 93 प्रतिशत हिस्सा राज्यों को मिलता है, जबकि जीएसटी के अलावा केंद्र को कोई बड़ी आय नहीं मिलती है और वह जीएसटी भी राज्यों को वापस दे दिया जाता है। रॉयल्टी से संबंधित आय का लगभग तीन प्रतिशत हिस्सा खोज गतिविधियों पर खर्च किया जाता है। सहकारी संघवाद के महत्व पर जोर देते हुए उन्होंने कहा कि केंद्र सरकार राज्यों के अधिकारों का सम्मान करती है और साथ ही खनन क्षेत्र में आर्थिक विकास तथा प्रतिस्पर्धा सुनिश्चित करने की आवश्यकता को भी समझती है। उन्होंने राज्यों से खनन नीतियों के प्रति व्यापक और समझदारी भरा दृष्टिकोण अपनाने तथा उद्योग विकास के लिए तर्कसंगत कर ढांचा तैयार करने का आह्वान किया।
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