वैवाहिक जीवन में प्रताड़ित बेटी का साथ दें, किसी बड़ी दुर्घटना का इंतज़ार न करें
बेटी का मायके लौटना शर्म की बात नहीं, सुरक्षा और सम्मान अधिक महत्वपूर्ण: कोर्ट
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 3:11 · अपडेट सुबह 3:24 · 3 मिनट का पाठ
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दिल्ली हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा है कि यदि कोई बेटी अपने वैवाहिक जीवन में हिंसा या प्रताड़ना की शिकायत करती है, तो माता-पिता को उसकी बातों को अत्यंत गंभीरता से लेना चाहिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विवाह बचाने के लिए समझौता करने की सलाह देकर बेटी को चुप नहीं रखा जाना चाहिए। अदालत ने आगे कहा कि बेटी का मायके लौटना परिवार के लिए शर्म की बात नहीं होनी चाहिए।
दैनिक भास्कर की रिपोर्ट के अनुसार, हाईकोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि किसी भी महिला के लिए विवाह से अधिक उसकी सुरक्षा और सम्मान महत्वपूर्ण है। बेटी की मदद करने के लिए किसी बड़ी अनहोनी या दुर्घटना घटने का इंतज़ार नहीं किया जाना चाहिए। यह टिप्पणी जस्टिस मधु जैन द्वारा 2018 के एक आत्महत्या के मामले की सुनवाई के दौरान की गई थी।
यह मामला फ्लाइट अटेंडेंट अनिसिया बत्रा से जुड़ा था, जिन्होंने 13 जुलाई 2018 को दक्षिण दिल्ली के पंचशील पार्क में कथित तौर पर आत्महत्या कर ली थी। 39 वर्षीय अनिसिया जर्मन एयरलाइंस में कार्यरत थीं। उनके माता-पिता ने आरोप लगाया था कि उनके पति उन्हें शारीरिक रूप से प्रताड़ित करते थे। घटना के समय उनके पति मयंक सिंघवी उन्हें अस्पताल ले गए थे, जहाँ डॉक्टरों ने उन्हें मृत घोषित कर दिया था।
इस मामले की सुनवाई के बाद हाईकोर्ट ने पति मयंक सिंघवी को क्रूरता और आत्महत्या के लिए उकसाने के आरोपों से बरी कर दिया है। इस फैसले के दौरान कोर्ट ने वैवाहिक विवादों में पति के रिश्तेदारों पर सामूहिक रूप से क्रूरता के आरोप लगाने की प्रवृत्ति पर भी चिंता व्यक्त की। अदालत ने कहा कि किसी व्यक्ति को केवल पति का रिश्तेदार होने के कारण आपराधिक मामले में आरोपी नहीं बनाया जाना चाहिए। किसी भी व्यक्ति पर आरोप लगाने के लिए उसकी स्पष्ट भूमिका या सबूत होना अनिवार्य है।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि वैवाहिक विवाद या तनावपूर्ण संबंध अपने आप में आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध नहीं बनते। इसके लिए सामने वाले व्यक्ति की सक्रिय और इरादतन भूमिका साबित होना आवश्यक है। अदालत ने यह भी नोट किया कि आत्महत्या से पहले यदि महिला ने किसी संदेश में किसी व्यक्ति को जिम्मेदार ठहराया हो, तो केवल उसके आधार पर आत्महत्या के लिए उकसाने का अपराध साबित नहीं होता।
इस मामले में अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया था कि अनिसिया को शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया था। आरोप था कि उनसे पैसे मांगे जाते थे और उनकी माता के साथ संयुक्त रूप से उनके नाम पर स्थित फ्लैट की बिक्री से प्राप्त राशि को लेकर दबाव बनाया जाता था। अनिसिया की माता ने भी आरोप लगाया था कि उनके दामाद और सास-ससुर लगातार पैसों की मांग करते थे।
इस मुद्दे पर दिल्ली हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि विवाह के दौरान पैसों की हर मांग या लेन-देन को दहेज नहीं माना जा सकता। दहेज साबित करने के लिए उस मांग का विवाह से सीधा संबंध होना आवश्यक है। इस प्रकार, कोर्ट ने एक ओर माता-पिता को बेटी के समर्थन के लिए प्रोत्साहित किया, तो दूसरी ओर बिना सबूत परिवार के सदस्यों को फंसाने की प्रवृत्ति के खिलाफ चेतावनी दी।
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