मुख्य चुनाव आयुक्त को मिलने वाली मुक्ति के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट का नोटिस
वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई शुरू
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
4 नवंबर 2026, शाम 4:42 · अपडेट सुबह 8:31 · 4 मिनट का पाठ
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नई दिल्ली में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) और अन्य चुनाव आयुक्तों को वर्ष 2023 के कानून के तहत मिलने वाली पूर्ण मुक्ति (ब्लांकेट इम्युनिटी) के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया है। इंडिया टुडे की रिपोर्ट के अनुसार, चीफ जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जोयमाल्या बागची तथा जस्टिस वी. मोहन की खंडपीठ ने इस मामले में जवाब मांगा है। याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अधिनियम, 2023 की धारा 16 की संवैधानिक वैधता को चुनौती दी गई है।
संसद द्वारा पिछले वर्ष पारित किए गए इस कानून में ऐसी व्यवस्था की गई है कि मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त अपने कार्यकाल के दौरान आधिकारिक क्षमता में किए गए कार्यों या लिए गए निर्णयों के लिए किसी भी कानूनी कार्यवाही या कदमों से सुरक्षित रहेंगे। याचिकाकर्ता और वकील अरुण कुमार अग्रवाल द्वारा की गई दलीलों में तर्क दिया गया है कि यह प्रावधान बिना किसी अपवाद के पूर्ण सुरक्षा प्रदान करता है, जिसमें ऐसे कार्यों भी शामिल हैं जो सद्भावना से नहीं किए गए हों या जो अधिकारियों के अधिकार क्षेत्र से बाहर हों।
याचिका में आगे कहा गया है कि ऐसी व्यापक सुरक्षा नागरिकों को मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों के खिलाफ उपलब्ध दीवानी और आपराधिक उपायों से वंचित करती है। याचिकाकर्ता का मानना है कि चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की रक्षा करने का अर्थ यह नहीं है कि उसके सदस्यों को कानूनी जिम्मेदारी से पूर्ण मुक्ति दे दी जाए। इसलिए, याचिकाकर्ता ने वर्ष 2023 के कानून की धारा 16 को असंवैधानिक घोषित करने की मांग की है।
यह नोटिस तब जारी किया गया है जब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग के मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरावृत्ति (SIR) को चुनौती देने वाली अन्य याचिकाओं की सुनवाई कर रहा था। इस सुनवाई के दौरान खंडपीठ ने चुनाव आयोग के कामकाज और मतदाताओं की सुरक्षा के संबंध में कई सवाल उठाए। कोर्ट ने पूछा कि क्या यह प्रक्रिया मतदाताओं को परेशान करने या डराने के लिए बनाई गई है? कोर्ट ने दिल्ली में जब कोई चुनाव नजदीक न हो, तब इस कवायद को करने की तात्कालिकता पर भी प्रश्न किए।
खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि चुनाव आयोग को सख्त समय सीमा का आग्रह नहीं करना चाहिए और फॉर्म जमा करने की प्रक्रिया देरी होने के बावजूद जारी रखनी चाहिए। कोर्ट ने इस बात पर भी आश्चर्य व्यक्त किया कि जिन मतदाताओं के नाम पहले से ही मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन ड्राफ्ट सूची से गायब थे, उन्हें फिर से फॉर्म 6 भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है। जस्टिस बागची ने प्रश्न किया कि क्या किसी मतदाता की लापरवाही के लिए उन्हें मतदान के अधिकार से स्थायी रूप से वंचित करके सजा दी जा सकती है?
कोर्ट ने चुनाव आयोग को निर्देश दिया है कि हटाए गए मतदाताओं की भौतिक सूचियां स्थानीय भाषाओं में ब्लॉक स्तर पर प्रदर्शित की जाएं। कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं और मतदाताओं को आश्वासन दिया कि घबराने की जरूरत नहीं है क्योंकि ये मामले कोर्ट में विचाराधीन हैं। चुनाव आयोग ने कोर्ट को बताया कि वे दिल्ली में समय सीमा बढ़ाने और फॉर्म स्वीकार करने की प्रक्रिया में छूट देने के संबंध में विचार करेंगे। इस मामले में अगली सुनवाई 19 नवंबर को निर्धारित की गई है।
कोर्ट ने आगे स्पष्ट किया कि SIR के तहत नाम हटाए जाने या समय सीमा समाप्त होने से कोई मतदाता स्थायी रूप से मतदाता सूची में शामिल होने से नहीं रुक जाता है। नागरिक नामांकन पत्र भरने की अंतिम तिथि तक सूची में सुधार के लिए आवेदन कर सकते हैं। चुनाव आयोग भारत का एक संवैधानिक संस्थान है जो देश में मुक्त और निष्पक्ष चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार है। इस संस्थान की स्थापना भारतीय संविधान के तहत की गई थी और यह लोकतांत्रिक प्रक्रिया में मतदाताओं के अधिकारों की रक्षा के लिए कार्य करता है।
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