मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के लिए नए भवनों के निर्माण प्रस्ताव को राज्य सरकार की मंजूरी
उलगनेरी में मंदिर की जमीन पर अतिरिक्त सुविधाओं के निर्माण के लिए प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी दो सप्ताह में मिल जाएगी।
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
30 अक्टूबर 2026, दोपहर 1:27 · अपडेट रात 9:28 · 7 मिनट का पाठ
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तमिलनाडु सरकार ने मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच के लिए अतिरिक्त भवनों के निर्माण के प्रस्ताव को सिद्धांत स्तर पर स्वीकार कर लिया है। मदुरै के उलगनेरी में वर्तमान कोर्ट भवनों के ठीक सामने स्थित मंदिर की जमीन पर इन नए भवनों का निर्माण किया जाएगा। एडवोकेट जनरल विजय नारायण ने जस्टिस जी. जयचंद्रन और के.के. रामकृष्णन की डिवीजन बेंच के समक्ष यह जानकारी दी।
एडवोकेट जनरल नारायण ने बताया कि मुख्यमंत्री सी. जोसेफ विजय, कानून मंत्री सी.टी.आर. निर्मल कुमार और वित्त मंत्री एन. मेरी विल्सन इन फाइलों को मंजूरी देंगे। प्रशासनिक और वित्तीय मंजूरी के साथ सरकारी आदेश अगले दो सप्ताह में जारी कर दिया जाएगा। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें मुख्य सचिव एम. साई कुमार से मौखिक सूचना मिली है कि इस परियोजना को मंजूरी दे दी गई है। अब केवल फाइल की प्रक्रिया बाकी है और जल्द ही निर्माण के लिए आधारशिला रखी जा सकेगी।
हाईकोर्ट प्रशासन द्वारा 1 अक्टूबर, 2026 को संशोधित निर्माण योजना और विस्तृत अनुमान के साथ प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा गया था। यह पत्र सरकार को 7 अक्टूबर, 2026 को मिला था। जांच के बाद, गृह विभाग ने 16 अक्टूबर, 2026 को फाइल को सार्वजनिक निर्माण विभाग (PWD) को भेज दिया था। PWD ने 27 अक्टूबर, 2026 को फाइल को क्लियर कर दिया और उसी दिन इसे वित्त विभाग को भेज दिया गया। एडवोकेट जनरल ने कहा कि राज्य सरकार पूरे राज्य में न्यायिक बुनियादी ढांचे के प्रस्तावों को मंजूरी देने के लिए उत्सुक है। राज्य में लगभग 900 प्रस्ताव हैं, जिनमें से हाईकोर्ट की रजिस्ट्रार जनरल दीप्ति अरिवेनिथि ने प्राथमिकता के आधार पर मंजूर किए जाने वाले प्रस्तावों की सूची प्रदान की है।
एडवोकेट जनरल ने बेंच को बताया कि उन्होंने वित्त सचिव एम.ए. सिद्दीक से बात की है, जो अदालतों के लिए बेहतर बुनियादी ढांचा प्रदान करने में बहुत सक्रिय हैं। उन्होंने आश्वासन दिया कि न केवल हाईकोर्ट, बल्कि राज्य की सभी अदालतों के सभी प्रस्तावों को एक-एक करके मंजूरी दी जाएगी। इस बीच, जस्टिस जयचंद्रन ने सवाल किया कि हाईकोर्ट का 1 अक्टूबर, 2026 का प्रस्ताव फोर्ट सेंट जॉर्ज में 7 अक्टूबर, 2026 को क्यों मिला? उन्होंने पूछा कि क्या दो किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करने में सात दिन लगते हैं? एडवोकेट जनरल ने स्पष्ट किया कि हालांकि पत्र 1 अक्टूबर का था, लेकिन रजिस्टर्ड पोस्ट की रसीद दर्शाती है कि इसे 6 अक्टूबर को पोस्ट किया गया था, इसलिए सरकार को यह 7 अक्टूबर को मिला। हालांकि, हाईकोर्ट प्रशासन के वकील ने कहा कि संदेश विशेष मैसेंजर द्वारा भी भेजा गया था। दोनों पक्षों को सुनने के बाद, न्यायाधीशों ने सभी रिकॉर्ड मंगवाकर देरी के कारण की जांच करने का निर्णय लिया और इस मामले को तीन सप्ताह के लिए स्थगित कर दिया।
इस भूमि अधिग्रहण का इतिहास लंबा है। 2019 में एडवोकेट एम. सरवणन द्वारा एक जनहित याचिका (PIL) दायर की गई थी, जिसमें मदुरै के ओथकाडाई में कोठंडरामस्वामी मंदिर की 9.49 एकड़ जमीन अधिग्रहित करने के लिए सरकार को निर्देश देने की मांग की गई थी। इसके साथ ही मंदिर की जमीन पर मांस की दुकानों द्वारा फेंके जाने वाले कचरे और जानवरों के अवशेषों को साफ करने के लिए भी दो अन्य PIL याचिकाओं पर सुनवाई की गई थी। तमिलनाडु प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और स्थानीय निकायों के अधिकारियों को संपत्ति साफ रखने का निर्देश दिया गया था।
10 जून, 2023 को, हाईकोर्ट प्रशासन ने सरकार को प्रस्ताव भेजा था कि उन्हें कार पार्किंग, कोर्ट स्टाफ के लिए अतिरिक्त क्वार्टर, कम्युनिटी हॉल, ऑडिटोरियम/कॉन्फ्रेंस हॉल और मदुरै बेंच के लिए रिकॉर्ड रूम के साथ जुड़े डिजिटलीकरण केंद्र जैसी अतिरिक्त बुनियादी सुविधाएं बनाने के लिए 6.51 एकड़ जमीन की आवश्यकता है। इसके बाद, 2025 में जमीन का बड़ा हिस्सा अधिग्रहित करने के लिए कई कानूनी बाधाओं को दूर करना पड़ा। संपत्ति पर विरोधी दावे होने के कारण, 24 सितंबर, 2025 को जिला अदालत में ₹17.63 करोड़ की राशि जमा की गई थी। भूमि अधिग्रहण के बाद, हाईकोर्ट की बिल्डिंग कमेटी ने निर्माण योजना को मंजूरी दी थी, लेकिन 2026 के तमिलनाडु विधानसभा के आम चुनाव के दौरान आदर्श आचार संहिता लागू होने के कारण काम आगे नहीं बढ़ सका था।
दूसरी ओर, मद्रास हाईकोर्ट की मदुरै बेंच ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है कि अन्य धर्मों के धार्मिक प्रतीक पहनने वाले गैर-हिंदुओं को आगमिक मंदिरों में प्रवेश नहीं मिलेगा यदि वे संबंधित देवता के प्रति सम्मान व्यक्त नहीं करते हैं। यह फैसला वर्तमान व्यवस्था से आगे जाता है, जिसमें पहले केवल ध्वजस्तंभ पार करने के इच्छुक गैर-हिंदुओं को देवता में विश्वास रखने और मंदिर की परंपराओं का पालन करने की आवश्यकता थी। अब प्रतिबंध ध्वजस्तंभ के आसपास के क्षेत्रों से बढ़कर पूरे आगमिक मंदिर परिसर में लागू होंगे। न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन और पी. मुरुगन की डिवीजन बेंच ने मंदिर प्रवेश और आगमिक आदेशों के पालन संबंधी याचिका पर यह फैसला सुनाया।
अदालत ने कहा कि यह आदेश अन्य धर्मों के प्रतीक पहनने वाले सभी लोगों पर पूर्ण प्रतिबंध नहीं है। हालांकि, अदालत ने यह स्पष्ट नहीं किया कि यदि कोई गैर-हिंदू निर्धारित शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करता है तो क्या वह प्रतीक पहनकर प्रवेश पा सकेगा या नहीं। न्यायाधीशों ने सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक वीडियो का उल्लेख किया, जिसमें दिख रहा था कि तिरुवन्नामलाई के अरुणाचलेश्वर मंदिर में भक्तों के विरोध के बावजूद स्कल कैप पहने लोग प्रवेश कर रहे थे। अदालत ने मंदिर के स्टाफ की आलोचना की कि वे केवल "मूक दर्शक" बने हुए थे। अदालत ने राजनीतिक नेताओं के उदाहरण भी दिए, जिसमें मदुरै सेंट्रल के विधायक बदरुद्दीन मुस्तफा का उल्लेख था जिन्होंने चुनाव के बाद सुविधाओं का निरीक्षण करने का दावा करते हुए मीनाक्षी मंदिर में प्रवेश किया था और कुंभाभिषेक के दौरान मंदिर के शिखरों पर गए थे। साथ ही एक ईसाई मंत्री का उल्लेख किया जिन्होंने आवश्यक शपथ-पत्र दिए बिना तिरुचेंदूर मंदिर में प्रवेश किया था।
इसकी तुलना में, अदालत ने मुख्यमंत्री जोसेफ विजय का उल्लेख किया, जो ईसाई धर्म का पालन करने के बावजूद, शपथ-पत्र पर हस्ताक्षर करने के बाद मीनाक्षी मंदिर में पूजा करने गए थे। न्यायाधीशों ने कहा कि उन्हें धर्म परिवर्तन करने के लिए नहीं कहा गया था, बल्कि केवल देवता के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए कहा गया था, जिसे उन्होंने "समावेशी दृष्टिकोण" के रूप में वर्णित किया। यह फैसला केवल आगमिक मंदिरों तक सीमित है, क्योंकि अय्यप्पा और शिरडी साईं बाबा जैसे मंदिरों में विभिन्न धर्मों के भक्त आते हैं।
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