दिल्ली में अशांति रोकने के लिए पुलिस की एक्स-पार्टे प्रतिबंधात्मक आदेशों की मांग
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में दिल्ली पुलिस ने 60 दिनों के प्रतिबंधों का बचाव किया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
5 नवंबर 2026, दोपहर 1:54 · 3 मिनट का पाठ
यह समाचार AI ने नीचे दिए स्रोतों से लिखा है; इसका हर दावा और आँकड़ा उन स्रोतों से मिलाकर ही प्रकाशित किया गया है। हम कैसे जाँचते हैं
द हिंदू की रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में कानून और व्यवस्था बनाए रखने के नाम पर दिल्ली पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में सात अलग-अलग प्रतिबंधात्मक आदेश पेश किए हैं। भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 163 के तहत ये आदेश लागू किए गए हैं। पुलिस कमिश्नर अनुराग कुमार ने सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हलफनामे में कहा है कि ये आदेश 'एक्स-पार्टे' यानी किसी भी पक्ष को सुने बिना जारी किए गए हैं, क्योंकि हर व्यक्ति को व्यक्तिगत रूप से नोटिस देना संभव नहीं है। ये प्रतिबंध अधिकतम 60 दिनों की अवधि के लिए हैं, जो अक्टूबर के उत्तरार्ध तक लागू रहेंगे।
पुलिस के अनुसार, इन आदेशों का मुख्य उद्देश्य सार्वजनिक सभाओं, जुलूसों और प्रदर्शनों के कारण यातायात में बाधा, मानव सुरक्षा को जोखिम और सार्वजनिक शांति में खलल को रोकना है। इन प्रतिबंधों के तहत पांच या उससे अधिक व्यक्तियों के इकट्ठा होने, नारेबाजी करने, भाषण देने, पिकेटिंग या धरना देने पर रोक लगा दी गई है। इसके अलावा, हथियारों, लाठियों, तलवारों, डंडों, बैनरों और प्लेकार्ड्स को ले जाने पर भी मनाही की गई है। ये आदेश कनॉट प्लेस, तुगलक रोड, पार्लियामेंट स्ट्रीट, चाणक्यपुरी, बाराखंभा रोड, सफदरजंग एन्क्लेव और डिफेंस कॉलोनी जैसे संवेदनशील इलाकों में लागू किए गए हैं। गौरतलब है कि चाणक्यपुरी इलाके में प्रधानमंत्री का आवास, राष्ट्रपति भवन और विदेशी दूतावास स्थित हैं।
ये आदेश मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग के साथ हुए विरोध प्रदर्शनों से पहले ही लागू कर दिए गए थे। 20 अगस्त के आसपास जारी किए गए छह आदेश, जुलाई 2026 में NEET-UG पेपर लीक के खिलाफ हुए हिंसक विरोध प्रदर्शनों के एक महीने बाद आए थे। इन प्रतिबंधों में से एक आदेश 26 सितंबर से 24 नवंबर तक लागू है।
पुलिस के इस कदम के खिलाफ कई राजनीतिक नेताओं, वकीलों और कार्यकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। इसमें CPI(M) के राज्य सचिव एम.ए. बेबी, राज्यसभा सांसद ए.ए. रहीम, वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी और एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी शामिल हैं। याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि 10 और 11 अक्टूबर को मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग के साथ हुए विरोध के दौरान पुलिस ने लगभग 7,000 लोगों को अवैध रूप से हिरासत में लिया था। इस दौरान दिल्ली मेट्रो सेवा बंद कर दी गई थी, मुख्य सड़कों पर बैरिकेड्स लगा दिए गए थे और ट्रेनें रद्द कर दी गई थीं, जिसके कारण हजारों यात्री फंस गए थे।
एडवोकेट शैलेंद्र मणि त्रिपाठी ने अपने वकील चांद कुरैशी के माध्यम से दलील दी कि यह शटडाउन सुप्रीम कोर्ट के 9 अक्टूबर के आदेश का स्पष्ट उल्लंघन है, जिसमें स्पष्ट रूप से कहा गया था कि अधिकारियों को आम यात्रियों को परेशानी में नहीं डालना चाहिए। पुलिस का कहना है कि मानव जीवन और सुरक्षा को बचाने के लिए ये 'त्वरित कदम' उठाना अत्यंत आवश्यक थे।
दिल्ली पुलिस राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली की कानून प्रवर्तन एजेंसी है, जो गृह मंत्रालय के तहत कार्यरत है। यह दिल्ली में शांति और व्यवस्था बनाए रखने, अपराध रोकने और नागरिकों की सुरक्षा के लिए जिम्मेदार है। अतीत में भी इस संस्था ने राजधानी में सुरक्षा व्यवस्था बनाए रखने के लिए विभिन्न प्रतिबंधात्मक उपायों का उपयोग किया है।
ન્યુઝીલેન્ડ સામે ટેસ્ટ શ્રેણી પૂર્વે બુમરાહ અને જાડેજા ઈન્ડિયા એ ટીમમાં સામેલ થશે
લિંકન ખાતે શનિવારથી શરૂ થતી ન્યુઝીલેન્ડ એ સામેની અંતિમ ચાર-દિવસીય મેચમાં દિગ્ગજ ખેલાડીઓ રમશે
NHAI ने चार लेन और उससे अधिक चौड़े राजमार्गों के लिए बैरियर-लेस टोलिंग गाइडलाइन्स जारी कीं
नई तकनीक के माध्यम से वाहनों को टोल बूथ पर रोके बिना ही टोल संग्रह किया जाएगा
BCI ने लॉ कोर्स के लिए आयु सीमा हटाई, सुप्रीम कोर्ट ने याचिका का निपटारा किया
3 वर्ष और 5 वर्ष के LLB कोर्स में अब उम्र का कोई बंधन नहीं रहेगा