निवारक निरोध की शक्ति का प्रयोग सावधानी से करें: राज्यों को सुप्रीम कोर्ट की चेतावनी
वरिष्ठ IPS अधिकारी की अपील स्वीकार करते हुए कोर्ट ने व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार पर जोर दिया
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
6 नवंबर 2026, सुबह 5:55 · अपडेट सुबह 9:59 · 4 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को कहा कि राज्य सरकारों को निवारक निरोध (preventive detention) की शक्ति का उपयोग अत्यंत सावधानी, विचारशीलता और कानूनी आवश्यकताओं के कड़े पालन के साथ करना चाहिए। कोर्ट ने नोट किया कि इस शक्ति का उपयोग व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर सीधा प्रभाव डालता है, इसलिए इसकी सावधानीपूर्वक देखभाल अनिवार्य है।
जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस आर. महादेवन और जस्टिस ए.के. सिंह की बेंच ने वरिष्ठ IPS अधिकारी ए. अरुण द्वारा दायर एक अपील पर सुनवाई के दौरान यह टिप्पणी की। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सभी सार्वजनिक प्राधिकरणों को कानून द्वारा निर्देशित होना चाहिए। निवारक निरोध के मामलों में तथ्यों और कानून का उचित मूल्यांकन अधिक महत्वपूर्ण हो जाता है, क्योंकि यह व्यक्ति के जीवन और स्वतंत्रता के मौलिक अधिकार को सीधे प्रभावित करता है।
कोर्ट ने अपने फैसले में कहा, "सार्वजनिक प्राधिकरण द्वारा तथ्यों और लागू कानून का सावधानीपूर्वक मूल्यांकन किया जाना चाहिए। निवारक निरोध के मामलों में यह बात विशेष महत्व रखती है, जहां वैधानिक शक्ति का उपयोग व्यक्ति की स्वतंत्रता को प्रभावित करता है। इसलिए, ऐसी शक्ति का उपयोग अत्यंत सावधानीपूर्वक और कानून की आवश्यकताओं के कड़े अनुपालन के साथ किया जाना चाहिए।"
यह पूरा मामला वरिष्ठ IPS अधिकारी ए. अरुण की अपील से जुड़ा था, जिसमें उन्होंने मई में मद्रास हाई कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ की गई कुछ "प्रतिकूल टिप्पणियों" (adverse remarks) को हटाने की मांग की थी। मद्रास हाई कोर्ट ने एक रियल एस्टेट डेवलपर संतोष शर्मा के खिलाफ तमिलनाडु गुंडा एक्ट (Tamil Nadu Goondas Act) लागू करने के लिए अरुण की कड़ी आलोचना की थी।
उस समय जस्टिस जी.आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मणरायन की बेंच ने निरोध आदेश को रद्द कर दिया था। हाई कोर्ट ने फैसला सुनाया था कि शर्मा के खिलाफ आरोप अपार्टमेंट की बिक्री और कथित धोखाधड़ी वाले पंजीकरण के विवादों से संबंधित थे, जो निवारक निरोध कानून लागू करने के लिए पर्याप्त नहीं थे। कोर्ट का मानना था कि ये व्यक्तिगत विवाद थे और इससे सार्वजनिक व्यवस्था या सामाजिक जीवन की गति बाधित होने की कोई संभावना नहीं थी।
ए. अरुण के खिलाफ कड़ी टिप्पणी करते हुए मद्रास हाई कोर्ट ने नोट किया था कि उन्होंने बार-बार निरोध आदेश जारी किए थे जिन्हें बाद में अदालतों द्वारा रद्द कर दिया गया था। हाई कोर्ट ने दो साल से अधिक पुराने मामलों पर निर्भर रहने और सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित न होने वाले मामलों में निवारक निरोध का उपयोग करने पर सवाल उठाए थे। हाई कोर्ट ने कहा था, "उन्हें पता होना चाहिए कि निवारक निरोध का आदेश लापरवाही से पारित नहीं किया जा सकता क्योंकि इसका हिरासत में लिए गए व्यक्ति की स्वतंत्रता पर गंभीर प्रभाव पड़ता है।"
सुप्रीम कोर्ट में ए. अरुण ने स्वीकार किया कि उनसे गलती हुई है और वे बिना शर्त माफी मांगने के लिए तैयार हैं। उनके वकील सीनियर एडवोकेट सिद्धार्थ लूथरा ने तर्क दिया कि यदि ये प्रतिकूल टिप्पणियां रिकॉर्ड पर रहती हैं, तो इसका अरुण की पेशेवर प्रतिष्ठा और करियर पर गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।
ए. अरुण ने एक हलफनामा पेश कर बिना शर्त माफी मांगी, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड पर ले लिया। कोर्ट ने नोट किया कि अरुण ने हाई कोर्ट के समक्ष माफी न मांगने और 22 सितंबर 2025 को निरोध आदेश पारित करने में हुई गलती को स्वीकार न करने पर खेद व्यक्त किया है। इसके अलावा, अरुण ने सुप्रीम कोर्ट को आश्वासन दिया कि वे भविष्य में अपने आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन में अधिक सावधानी बरतेंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने उनकी माफी स्वीकार कर ली और मद्रास हाई कोर्ट के मई के फैसले में की गई प्रतिकूल टिप्पणियों को हटाने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने अंत में यह टिप्पणी की कि पुलिस प्रशासन में वरिष्ठ पद पर रहने वाले अधिकारी से यह अपेक्षा की जाती है कि वह उन्हें सौंपे गए कर्तव्यों के महत्व और वैधानिक शक्तियों के उपयोग से जुड़ी जिम्मेदारी को समझें।
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