विदेशी नागरिक होना UAPA के तहत जमानत खारिज करने के लिए पर्याप्त नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि विदेशी नागरिक कानूनी रूप से भारत में प्रवेश करता है, तो उसे जमानत मिल सकती है
लेखक कैपिटल क्रांति डेस्क, गांधीनगर · संपादक: पार्थ ठक्कर
29 अक्टूबर 2026, सुबह 11:58 · 6 मिनट का पाठ
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सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल विदेशी नागरिक होने के कारण UAPA के तहत मामलों में जमानत देने से इनकार नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई विदेशी नागरिक कानूनी और अधिकृत रूप से भारत में प्रवेश करता है, तो वह UAPA के तहत जमानत पाने का हकदार हो सकता है। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने मद्रास हाईकोर्ट के उस निर्णय को बरकरार रखा है जिसमें श्रीलंकाई नागरिक मोहम्मद रिफास को जमानत देने का आदेश दिया गया था।
जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस विपुल एम. पंचोली की बेंच ने केंद्र सरकार की अपील को खारिज कर दिया। कोर्ट ने नोट किया कि नेशनल इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (NIA) ने ऐसे कोई सबूत पेश नहीं किए हैं जो यह साबित कर सकें कि आरोपी मोहम्मद रिफास अवैध रूप से भारत की सीमा में प्रवेश किया था। कोर्ट ने कहा कि यदि कोई विदेशी नागरिक वैध वीजा के साथ भारत आया है, तो केवल वीजा की अवधि समाप्त होने या उसके बाद उसका प्रवास अवैध होने से उसे UAPA की धारा 43D(7) के तहत जमानत से वंचित नहीं किया जा सकता।
UAPA की धारा 43D(7) के तहत जमानत देने की शर्तें बहुत कड़ी हैं। यह धारा तब लागू होती है जब आरोपी पर UAPA के तहत अपराध हो, वह भारतीय नागरिक न हो और उसने भारत की सीमा में अनधिकृत या अवैध रूप से प्रवेश किया हो। सुप्रीम कोर्ट ने अवलोकन किया कि अभियोजन पक्ष के लिए यह प्राथमिक रूप से साबित करना आवश्यक है कि आरोपी भारतीय नागरिक नहीं है और उसका भारत में प्रारंभिक प्रवेश अनधिकृत था। ये दोनों शर्तें एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं क्योंकि कानून में 'और' शब्द का उपयोग किया गया है, जिसका अर्थ है कि जमानत खारिज करने के लिए दोनों शर्तों का पूरा होना अनिवार्य है।
इस मामले का मुख्य आरोपी मोहम्मद रिफास उर्फ मोहम्मद रिगबास एक श्रीलंकाई नागरिक है। NIA के अनुसार, वह वर्ष 2009 में वैध वीजा पर भारत आया था, लेकिन वीजा की अवधि समाप्त होने के बाद भी वह यहाँ रुक गया था। उस पर धार्मिक समुदायों के बीच तनाव फैलाने, सरकार के खिलाफ साजिश रचने और फर्जी वोटर आईडी, आधार कार्ड तथा राशन कार्ड बनाने का आरोप है। जांच एजेंसी ने यह भी आरोप लगाया था कि उसने भारतीय पहचान से जुड़े दस्तावेज प्राप्त किए थे और उसने यहाँ विवाह भी किया था।
इस मामले की शुरुआत अप्रैल 2018 में तमिलनाडु में दर्ज हुई एफआईआर से हुई थी, जिसमें रिफास और अन्य पर सांप्रदायिक असंतुलन पैदा करने और सरकार के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष करने की साजिश का आरोप था। जुलाई 2018 में, जांच एजेंसी निर्धारित समय सीमा में चार्जशीट दाखिल करने में विफल रही थी, इसलिए ट्रायल कोर्ट ने उसे 'डिफ़ॉल्ट जमानत' दी थी। इसके बाद NIA ने जांच संभाली और जनवरी 2021 में चार्जशीट दाखिल की। नवंबर 2019 में एक अलग एफआईआर भी दर्ज की गई थी जिसमें आरोप था कि रिफास ने विदेशी नागरिकता छिपाकर भारतीय दस्तावेज प्राप्त किए थे।
केंद्र सरकार ने तर्क दिया था कि रिफास ने जमानत लेते समय अपनी श्रीलंकाई नागरिकता छिपाई थी, इसलिए उसकी जमानत रद्द की जानी चाहिए। अप्रैल 2022 में केंद्र सरकार ने ट्रायल कोर्ट में जमानत रद्द करने की अर्जी दी थी। जुलाई 2022 में स्पेशल कोर्ट ने सरकार का तर्क स्वीकार करते हुए जमानत रद्द कर दी थी, लेकिन दिसंबर 2023 में मद्रास हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस आदेश को पलट दिया और जमानत बहाल कर दी। केंद्र सरकार इसी निर्णय के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी।
सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र के उस तर्क को भी खारिज कर दिया कि नागरिकता छिपाना जमानत रद्द करने के लिए पर्याप्त कारण है। कोर्ट ने जोर देकर कहा कि रिफास को कानूनी रूप से 'डिफ़ॉल्ट जमानत' पाने का अधिकार था, जो CrPC की धारा 167(2) के तहत मिलता है और UAPA की धारा 43D(2) के माध्यम से यह अधिकार UAPA के मामलों में भी लागू होता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि धारा 43D(7) की प्रतिबंधात्मक शर्तें डिफ़ॉल्ट जमानत देने के कानूनी अधिकार को रद्द नहीं कर सकतीं।
इसके अलावा, कोर्ट ने नोट किया कि चार्जशीट जनवरी 2021 में सबमिट की गई थी, फिर भी जमानत रद्द करने की अर्जी अप्रैल 2022 में की गई थी, और सरकार इस देरी का संतोषजनक कारण नहीं दे सकी। कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जमानत रद्द करने की शक्ति और जमानत देने के आदेश को रद्द करने की शक्ति के बीच अंतर है। जमानत मिलने के बाद के व्यवहार या नई परिस्थितियों के आधार पर जमानत रद्द की जा सकती है, लेकिन यदि मूल जमानत का आदेश कानूनी रूप से अस्थिर या अप्रासंगिक है, तो ऊपरी अदालत उसमें हस्तक्षेप कर सकती है। हालांकि, ऐसी शक्ति का उपयोग सावधानीपूर्वक और ठोस तर्क के आधार पर ही किया जाना चाहिए क्योंकि व्यक्तिगत स्वतंत्रता का संवैधानिक मूल्य बहुत अधिक है।
कोर्ट ने धारा 43D(7) के महत्व पर प्रकाश डालते हुए कहा कि यह प्रावधान राष्ट्रीय सुरक्षा, सार्वजनिक हित और भारत की संप्रभुता को ध्यान में रखकर बनाया गया है। इस धारा के तहत जमानत देने के लिए बहुत ही असाधारण परिस्थितियां होनी चाहिए और इसके कारणों को लिखित में दर्ज करना आवश्यक है। इस धारा के तहत जमानत पाने का भार आरोपी पर रहता है। लेकिन ये कड़ी शर्तें तभी लागू होती हैं जब प्रवेश अवैध हो, जो इस मामले में साबित नहीं हो सका है। अंततः, सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र की अपील में कोई गुण न पाते हुए मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को बरकरार रखा।
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